- सुप्रीम कोर्ट ने यमुना नदी में बढ़ते प्रदूषण की अपनी स्वतः संज्ञान कार्यवाही को बंद कर दिया है.
- प्रदूषण नियंत्रण की निगरानी और अनुपालन की जिम्मेदारी अब राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण को सौंपी गई है.
- अदालत ने कहा कि बिना शोधन के सीवेज का नदियों में निर्वहन जल प्रदूषण निवारण अधिनियम के तहत निषेध है.
सुप्रीम कोर्ट ने देश की प्रदूषित नदियों, विशेषकर यमुना नदी में बढ़ते प्रदूषण को लेकर 2021 में शुरू की गई अपनी स्वतः संज्ञान कार्यवाही को बंद कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि अब इस मामले की निगरानी की जिम्मेदारी NGT को सौंपी जाती है. CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि एक ही विषय पर अलग-अलग और समानांतर कार्यवाहियों से निर्देशों की निरंतरता और एकरूपता प्रभावित हो रही थी. ऐसे में बेहतर होगा कि NGT इस मामले को फिर से खोले और अनुपालन की निगरानी करें.
पीठ ने याद दिलाया कि अदालत ने यमुना में बढ़ते प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लेते हुए दायरा बढ़ाकर नदियों में सीवेज के निर्वहन के मुद्दे को शामिल किया था और उतराखंड, हरियाणा, हिमाचल, यूपी और दिल्ली व केंद्र सरकार को नोटिस जारी किए थे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वच्छ और गरिमापूर्ण वातावरण में जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार का हिस्सा है.
बिना शोधन का सीवेज नदियों में न छोड़ा जाए : सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम के तहत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड वैधानिक रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं कि बिना शोधन का सीवेज नदियों में न छोड़ा जाए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि NGT को न्यायिक और अर्ध-न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं और वह इस तरह के पर्यावरणीय मामलों की प्रभावी निगरानी कर सकता है.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि केवल निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्थिति रिपोर्ट के माध्यम से निरंतर निगरानी भी आवश्यक है. पीठ ने कहा कि समानांतर स्वत: संज्ञान कार्यवाही जारी रखने के बजाय NGT द्वारा अनुपालन की निगरानी अधिक उपयुक्त होगी. साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि अपीलीय उपाय और न्यायिक पुनरावलोकन के अधिकार यथावत उपलब्ध रहेंगे.
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