इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 38 साल से हत्या के एक केस में सजा के खिलाफ उच्च अदालत में अपील का निपटारा न होने पर गंभीर सवाल उठाया है. अदालत ने ऐसे मामलों में वकील मुहैया कराने वाली लीगल सर्विसेज अथॉरिटी में वकीलों के पैनल पर नाराजगी जताई है. हत्या के इस मामले में दोषी ठहराए गए चार लोगों में से तीन की मौत भी हो चुकी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1988 से लंबित पड़ी एक क्रिमिनल अपील का अब तक निस्तारण न होने पर गंभीर चिंता जताई है. कोर्ट ने कहा कि यह बात अजीब है कि लीगल सर्विसेज अथॉरिटी ने ऐसे वकील को पैनल में कैसे शामिल कर लिया, जो दो जगहों पर प्रैक्टिस करता है.
कोर्ट ने माना कि लीगल सर्विसेज अथॉरिटी उस लिस्ट की एक बार फिर से समीक्षा करे, जिसे उसने तैयार किया है. कोर्ट ने कहा कि किसी भी सूरत में ऐसे वकील को नियुक्त नहीं किया जा सकता जो इलाहाबाद में नियमित रूप से प्रैक्टिस न करता हो. कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि लिस्ट में मौजूद कई सीरियल नंबर पर मौजूद वकीलों के पास इलाहाबाद हाईकोर्ट का एनरोलमेंट नंबर नहीं है.
कोर्ट ने निर्देश दिया कि लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (Legal Services Authority) को इस मामले के इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए. कोर्ट को हत्या के दोषी द्वारा 1988 में दायर की गई क्रिमिनल अपील पर वकील ढूंढने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी. हत्या के मामले में चार दोषियों में से तीन की मौत हो चुकी है और अब एक दोषी बचा हुआ है, जिसकी क्रिमिनल अपील अभी तक इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित है. कोर्ट ने अब मामले की गंभीरता देखते हुए वकील आलोक रंजन मिश्रा को बचे हुए दोषी की अपील पर बहस करने के लिए 'एमिकस क्यूरी' यानी न्याय मित्र (Amicus Curiae) नियुक्त किया है. यह आदेश जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस प्रशांत वर्मा–I की डिविजन बेंच ने दिया है.
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मामले के अनुसार, मई 1988 में इलाहाबाद के फूलपुर थाना क्षेत्र से जुड़े हत्या के मामले दोषी ठहराए जाने के बाद चार दोषियों भगवान दीन, गुरु दीन, राम दीन और सूरज दीन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी. ट्रायल कोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी. ट्रायल कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में दोषियों ने अपील थी. हालांकि उनकी जेल की सजा जल्द ही निलंबित कर दी गई थी, लेकिन उनकी अपील आज तक इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित है. केस रिकॉर्ड के अनुसार, 1988 में अपील दायर करने वाले वकील जेएस सेंगर का निधन हो गया. इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की सुनवाई के चलते तीन दोषी भगवान दीन, गुरु दीन और राम दीन की भी मौत हो गई. अब एक दोषी सूरज दीन की अपील अभी तक इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित पड़ी हुई है, जिस पर आज तक कोई फाइनल फैसला नहीं हो सका है. अपीलकर्ता सूरज दीन की कम से कम 2018 से लंबित अपील पर बहस करने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट को वकील ढूंढने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है क्योंकि आपराधिक अपील लगभग चार दशकों से रिकॉर्ड में लंबित पड़ी हुई है.
इस पर कोर्ट ने अब चिंता व्यक्त की है. कोर्ट को इतने पुराने मामले में बचे हुए अपीलकर्ता के लिए वकील ढूंढने में जो मुश्किल हुई है, उसको लेकर कोर्ट ने सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया गया है कि 'राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण' द्वारा कानूनी सहायता वकील के तौर पर पैनल में शामिल वकीलों की सूची की समीक्षा की जाए. कोर्ट ने अपीलकर्ताओं की तरफ से 1988 में क्रिमिनल अपील दाखिल करने वाले वकील जेएस सेंगर के देहांत के बाद फरवरी 2018 में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के जरिये दोषियों को नोटिस जारी किया और उनसे वकील रखने को कहा. लेकिन अप्रैल 2018 में CJM ने हाईकोर्ट को रिपोर्ट दी कि दोषी 20 साल पहले ही अपना गांव छोड़कर कहीं और चले गए. इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोषियों के जमानतदारों को नोटिस जारी करने का आदेश दिया था. जुलाई 2018 में वकील एच एन सिंह अपीलकर्ता सूरज दीन की ओर से कोर्ट में पेश हुए और बताया कि बाकी तीन दोषियों का निधन हो चुका है. इसके बाद अदालत ने इस मामले की सुनवाई अगस्त 2018 के लिए निर्धारित की थी.
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हालांकि आठ साल बाद रिकॉर्ड से कोर्ट को पता चला कि इस मामले पर इस साल सात जनवरी में ही सुनवाई हुई थी. जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस प्रशांत मिश्रा द्वारा पारित आदेश में यह दर्ज किया गया कि संबंधित CJM को भेजे गए दो पत्रों के जवाब में कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुआ था. 11 फरवरी 2026 को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि सूरज दीन की ओर से कोई वकील पेश नहीं हुआ और इसलिए केस की पैरवी के लिए वकील अंबर खन्ना को नियुक्त किया गया. वकील अंबर खन्ना का नाम लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी द्वारा तैयार की गई लीगल एड वकीलों की सूची में शामिल था. लेकिन 10 मार्च को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह दर्ज किया कि वकील अंबर खन्ना ने केस की पैरवी करने में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं दिखाई. यह 9 मार्च 2026 की ऑफिस रिपोर्ट से साफ हुआ.
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि रजिस्ट्रार जनरल ने 26 फरवरी को वकील अंबर खन्ना को पेपर बुक देने की कोशिश की थी. इस दौरान कोर्ट को बताया गया कि वकील अंबर खन्ना नोएडा और इलाहाबाद दोनों जगह प्रैक्टिस करते है. इस दौरान कोर्ट ने वकील अंबर खन्ना को पैनल में शामिल होने पर हैरानी जताई और लीगल एड वकीलों की पूरी लिस्ट खासकर अलग-अलग एरिया में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों की लिस्ट का रिव्यू करने का आदेश दिया. कोर्ट ने टिपण्णी करते हुए कहा कि यह अजीब बात है कि लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी ने ऐसे वकील को पैनल में कैसे शामिल कर लिया जो दो जगहों पर प्रैक्टिस करता है. इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया कि लीगल सर्विसेज अथॉरिटी अपनी तैयार की गई लिस्ट की एक बार फिर से समीक्षा करे.
कोर्ट ने कहा कि कोर्ट ऐसे वकील को नियुक्त नहीं करेगा, जो इलाहाबाद में नियमित रूप से प्रैक्टिस नहीं करता हो. कोर्ट ने कहा कि साथ ही लिस्ट से ये भी पता चलता है कि सीरियल नंबर 12, 17 और 29 पर मौजूद वकीलों के पास इलाहाबाद हाईकोर्ट का एनरोलमेंट नंबर नहीं है. कोर्ट ने कहा कि लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को इस मामले के इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए. वहीं कोर्ट ने अब वकील आलोक रंजन मिश्रा को बचे हुए दोषी की अपील पर बहस करने के लिए 'एमिकस क्यूरी' के तौर पर नियुक्त किया है. कोर्ट अब इस मामले में 8 अप्रैल को अगली सुनवाई करेगी.














