How To Lose 4 kg in 7 Days: वजन घटाने की चाह में लोग अक्सर ऐसे डाइट ट्रेंड्स की तरफ खिंच जाते हैं, जो कम समय में ज़्यादा नतीजे देने का दावा करते हैं. कभी कीटो डाइट चर्चा में रहती है, तो कभी इंटरमिटेंट फास्टिंग. लो-कार्ब, पैलियो, मेडिटेरेनियन और डैश डाइट जैसे नाम इंटरनेट पर बार-बार ट्रेंड करते रहे हैं. अब इसी लिस्ट में एक नया नाम जुड़ गया है. स्विच-ऑन डाइट. सोशल मीडिया पर यह डाइट तब चर्चा में आई, जब सियोल की एक मॉडल ने दावा किया कि उसने सिर्फ 7 दिनों में 4 किलो वज़न कम कर लिया.
इस डाइट को कोरिया के मशहूर वेट लॉस एक्सपर्ट डॉ. पार्क योंग-वू (Dr. Park Yong-woo) ने डिजाइन किया है. मोटापे पर रिसर्च करने वाले इस डॉक्टर ने एक 4-हफ्ते का प्रोग्राम बनाया है, जिसका मकसद शरीर के फैट बर्निंग मैकेनिज्म को एक्टिवेट करना है. लेकिन, सवाल यह है कि क्या यह डाइट सच में असरदार है और क्या इसे लंबे समय तक फॉलो किया जा सकता है?
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इसी सवाल का जवाब जानने के लिए हमने पुणे स्थित हेल्थ और वेलनेस प्लेटफॉर्म iThrive की CEO और फाउंडर, फंक्शनल न्यूट्रिशनिस्ट मुग्धा प्रधान (Mugdha Pradhan) से बात की.
स्विच-ऑन डाइट क्या है? (What is the Switch-On Diet?)
मुग्धा प्रधान बताती हैं कि हाल ही में वायरल हुई स्विच-ऑन डाइट तेज़ी से वजन घटाने, इंसुलिन सेंसिटिविटी सुधारने और कुछ ही हफ्तों में फैट बर्न करने के दावों की वजह से चर्चा में है. नाम भले ही नया और आकर्षक लगे, लेकिन असल में यह डाइट PSMF (Protein-Sparing Modified Fast) नाम के एक पुराने और रिसर्च-बेस्ड न्यूट्रिशन प्रोटोकॉल पर आधारित है.
यह तरीका दशकों से एथलीट्स और बॉडीबिल्डर्स द्वारा प्रतियोगिता से पहले "कटिंग फेज" में इस्तेमाल किया जाता रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य है मसल्स को बचाते हुए शरीर की चर्बी को तेजी से घटाना.
स्विच-ऑन डाइट कैसे काम करती है?
एक्सपर्ट के मुताबिक, इस डाइट में प्रोटीन का सेवन ज़्यादा होता है, जबकि फैट और कार्बोहाइड्रेट को बेहद कम कर दिया जाता है. इससे शरीर को खाने से मिलने वाले कार्ब्स की जगह शरीर में जमा फैट को एनर्जी के तौर पर इस्तेमाल करने की आदत पड़ती है.
मुग्धा बताती हैं, "इस कम-कैलोरी फेज में प्रोटीन ज़्यादा इसलिए दिया जाता है ताकि मसल्स टूटने न लगें. इसी वजह से शुरुआती हफ्तों में वज़न बहुत तेजी से घटता दिखाई देता है."
इसके अलावा इस डाइट में शराब, प्रोसेस्ड फूड, चीनी और कैफीन पूरी तरह हटा दिए जाते हैं, जिससे इंसुलिन स्पाइक्स कम होते हैं और पेट फूलने जैसी समस्याओं में भी राहत मिलती है.
स्विच-ऑन डाइट में इंटरमिटेंट फास्टिंग भी शामिल होती है, जिससे कुल कैलोरी और कम हो जाती है. शुरुआती डिटॉक्स या गट रीसेट फेज में प्रोटीन शेक, सब्ज़ियां और हाई-प्रोटीन फूड लिए जाते हैं.
क्या यह डाइट लंबे समय तक चल सकती है?
जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ते हैं, इस डाइट में धीरे-धीरे फल, चावल, लीन प्रोटीन और शकरकंद जैसे कार्बोहाइड्रेट दोबारा जोड़े जाते हैं. इसे ट्रांज़िशन फेज कहा जाता है और यह बेहद ज़रूरी होता है.
मुग्धा प्रधान चेतावनी देती हैं, "बहुत लंबे समय तक बहुत कम कैलोरी, ज़्यादा प्रोटीन और फास्टिंग वाले मोड में रहना सही नहीं है. अगर लोग इसे स्थायी डाइट बनाने की कोशिश करेंगे, तो थकान, बोरियत और पोषण की कमी हो सकती है."
उनके मुताबिक, PSMF और स्विच-ऑन डाइट एक शॉर्ट-टर्म टूल है, जो वज़न घटाने में आए ठहराव को तोड़ने में मदद कर सकता है, लेकिन यह ज़िंदगी भर का खाने का तरीका नहीं है.
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क्या स्विच-ऑन डाइट सही है?
स्विच-ऑन डाइट गलत नहीं है, क्योंकि इसके सिद्धांत न्यूट्रिशन साइंस पर आधारित हैं. लेकिन, इसे किसी जादुई या क्रांतिकारी समाधान की तरह देखना गलत होगा. शुरुआती वज़न घटने में फैट के साथ-साथ पानी और ग्लाइकोजन की कमी भी शामिल होती है.
असल बात यह है कि यह डाइट शरीर को ऑन या ऑफ करने का खेल नहीं है, बल्कि मेटाबॉलिज़्म को समझकर सही समय पर सही टूल इस्तेमाल करने की रणनीति है. अगर इसे एक्सपर्ट की देखरेख में सीमित समय के लिए अपनाया जाए, तो यह वज़न घटाने की यात्रा की एक अच्छी शुरुआत बन सकती है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)














