अल-फलाह यूनिवर्सिटी की संपत्तियां अटैच करने की तैयारी में ED, जानें किस मामले में हो रहा एक्शन

अल-फलाह यूनिवर्सिटी राष्ट्रीय राजधानी में पिछले साल लाल किले के पास हुए कार बम विस्फोट के बाद केंद्रीय एजेंसियों की जांच के घेरे में है.

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  • प्रवर्तन निदेशालय ने फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी पर मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोपों की जांच शुरू की है
  • यूनिवर्सिटी ने NAAC “Grade A” और UGC 12(B) मान्यता के खत्म होने के बावजूद झूठे दावे अपनी वेबसाइट पर दिखाए
  • ED ने यूनिवर्सिटी के संस्थापक जवाद अहमद सिद्दीकी को गिरफ्तार कर लगभग 415 करोड़ रुपये की आय का खुलासा किया
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फरीदाबाद:

दिल्ली ब्लास्ट की वजह से फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी जांच के दायरे में है. अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अल-फलाह यूनिवर्सिटी और उससे जुड़े समूहों पर मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोपों की जांच में बड़ा कदम उठाया है. सूत्रों के मुताबिक, एजेंसी जल्द ही यूनिवर्सिटी, अल-फलाह ग्रुप और संबंधित संस्थाओं की संपत्तियों को अस्थायी रूप से अटैच करने की तैयारी में है. 

जांच की शुरुआत कैसे हुई?

दरअसल ईडी ने यह जांच क्राइम ब्रांच की दो एफआईआर के आधार पर शुरू की थी. आरोप था कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी ने झूठे दावे कर NAAC “Grade A” मान्यता और UGC 12(B) स्टेटस दिखाया, जबकि ये मान्यताएं समाप्त हो चुकी थीं. यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर ये दावे लगातार प्रदर्शित किए जाते रहे.

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संस्थापक गिरफ्तार

18 नवंबर को ईडी ने अल-फलाह ग्रुप के संस्थापक चेयरमैन जवाद अहमद सिद्दीकी को गिरफ्तार किया था. मामले की जांच में सामने आया कि यूनिवर्सिटी ने मान्यता के नाम पर लगभग ₹415.10 करोड़ की आय जुटाई. इसके साथ ही ईडी की जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए जैसे-

  • संदिग्ध धन को शैक्षिक और चैरिटेबल संरचनाओं में लेयरिंग और इंटीग्रेशन के जरिए छिपाया गया
  • फर्जी जमीन खरीद और चैरिटेबल फंड्स का डायवर्जन किया गया
  • फरीदाबाद के दौज में हॉस्टल कॉम्प्लेक्स का निर्माण सिद्दीकी के परिवार की कंपनी ने किया
  • कैटरिंग सेवाएं भी परिवार की दूसरी कंपनी को दी गईं

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फर्जी दस्तावेज से जमीन खरीद

जांच में पता चला कि मदनपुर खादर (दिल्ली) में 500 वर्ग गज का प्लॉट 2013 में फाउंडेशन के नाम पर खरीदा गया. यह जमीन खसरा नंबर 792 में थी, जिसे तर्बिया एजुकेशन फाउंडेशन ने एक फर्जी GPA (07.01.2004) के जरिए हासिल किया. यह GPA उन जमीन मालिकों के नाम पर बनाई गई थी जो 1972 से 1998 के बीच मर चुके थे. बाद में यूनिवर्सिटी के फंड्स का इस्तेमाल कर यह जमीन खरीदी गई.

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