Makar Sankranti 2026: भारत में हर त्योहार सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके पीछे सेहत, मौसम और जीवन से जुड़ा गहरा विज्ञान छिपा होता है. लोहड़ी और मकर संक्रांति भी ऐसे ही त्योहार हैं, जिनमें तिल और गुड़ का खास महत्व होता है. इन दिनों घर-घर में तिल-गुड़ के लड्डू, चक्की और मिठाइयां बनाई जाती हैं. लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि तिल को कभी अकेले क्यों नहीं खाया जाता? हर बार उसके साथ गुड़ ही क्यों होता है?
यह सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि आयुर्वेद, मौसम और शरीर की जरूरतों से जुड़ा एक बेहद समझदारी भरा नियम है. सर्दियों के आखिरी दौर में मनाया जाने वाला यह त्योहार शरीर को अंदर से मजबूत करने का संदेश देता है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि तिल और गुड़ का यह मेल इतना खास क्यों माना गया है.
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सर्दियों में शरीर की जरूरत बदल जाती है:
मकर संक्रांति के आसपास ठंड अपने चरम पर होती है. इस मौसम में शरीर को ज्यादा एनर्जी, गर्माहट और पाचन शक्ति की जरूरत होती है. ठंड के कारण मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है और जोड़ों में अकड़न, सुस्ती और कमजोरी महसूस होने लगती है. ऐसे में जो चीजें शरीर को गर्म रखें और ताकत दें, वही सबसे ज्यादा फायदेमंद होती हैं.
तिल की तासीर गर्म, लेकिन असर तेज
तिल को आयुर्वेद में बहुत गर्म तासीर वाला माना गया है. इसमें हेल्दी फैट, कैल्शियम, आयरन और प्रोटीन भरपूर मात्रा में होता है. यह हड्डियों को मज़बूत करता है, जोड़ों के दर्द में राहत देता है और शरीर को अंदर से गर्म रखता है.
लेकिन, तिल की यही ताकत उसकी कमजोरी भी बन सकती है. अगर तिल को अकेले ज्यादा मात्रा में खा लिया जाए, तो इससे पेट में जलन, कब्ज, मुंह में छाले या शरीर में जरूरत से ज्यादा गर्मी हो सकती है.
यहीं से शुरू होती है गुड़ की भूमिका
गुड़ को आयुर्वेद में संतुलन बनाने वाला माना गया है. इसकी तासीर भी गर्म होती है, लेकिन यह शरीर में धीरे-धीरे असर करती है. गुड़ पाचन को सुधारता है, खून साफ करता है और तिल की तीव्र गर्मी को संतुलित करता है.
यही कारण है कि तिल के साथ गुड़ मिलाकर खाने से पेट पर जोर नहीं पड़ता, तिल आसानी से पच जाता है, शरीर को एनर्जी धीरे-धीरे मिलती है.
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तिल और गुड़ साथ क्यों जरूरी हैं?
तिल और गुड़ का साथ सेहत का परफेक्ट कॉम्बिनेशन माना जाता है. तिल शरीर को ताकत देता है, गुड़ पाचन को संभालता है, दोनों मिलकर इम्युनिटी बढ़ाते हैं. सर्दियों में शरीर को गर्म और एक्टिव रखते हैं. यही वजह है कि तिल के लड्डू, चक्की या रेवड़ी हमेशा गुड़ के साथ बनाई जाती है.
वैज्ञानिक नजर से भी सही है यह परंपरा:
न्यूट्रिशन भी मानता है कि तिल में मौजूद फैट-सॉल्युबल न्यूट्रिएंट्स गुड़ के मिनरल्स के साथ बेहतर तरीके से शरीर में एब्जॉर्ब होते हैं. यानी साथ खाने से पोषण का फायदा और बढ़ जाता है.
कितना और कैसे खाएं?
सर्दियों में रोज 1-2 तिल-गुड़ के लड्डू काफी होते हैं. ज्यादा खाने से फायदा नहीं, बल्कि नुकसान हो सकता है. डायबिटीज़ के मरीज गुड़ की मात्रा सीमित रखें और डॉक्टर की सलाह जरूर लें.
लोहड़ी हो या मकर संक्रांति, तिल और गुड़ का साथ सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि सेहत का देसी फॉर्मूला है. तिल अकेला तेज है, गुड़ अकेला अधूरा, लेकिन दोनों साथ हों, तो शरीर, मन और रिश्तों तीनों में मिठास और संतुलन बना रहता है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)














