Healthy Eating Secrets: आज के समय में पैकेज्ड फूड हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. चिप्स, कोल्ड ड्रिंक, नूडल्स, बिस्किट, चीज बॉल्स ये सब न सिर्फ आसानी से मिल जाते हैं, बल्कि देखने, सूंघने और खाने में इतने परफेक्ट लगते हैं कि हम चाहकर भी खुद को रोक नहीं पाते. लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? हाल ही में एक क्वालिफाइंड फिटनेस कोच, न्यूट्रिशनिस्ट, फूड सेफ्टी वॉरियर और फिट इंडिया चैंपियन ने NDTV के आदि कास्ट पॉडकास्ट में बताया कि इसके पीछे कंपनियों की बेहद सोची-समझी प्लानिंग होती है, जिसका मकसद है आपके दिमाग को हाइजैक करना.
पैकेट खुलते ही शुरू हो जाता है खेल
आप मानकर चलिए कि जब आप चिप्स का पैकेट खोलते हैं या कोल्ड ड्रिंक का ढक्कन खोलते हैं, तो उस फिज तक को इंजीनियर किया जाता है. कंपनियां यह तक टेस्ट करती हैं कि पैकेट खुलते समय कितनी आवाज आए, और उसके अंदर से कौन-सी खुशबू निकले. यह सब इसलिए ताकि आपका दिमाग तुरंत एक्टिव हो जाए और खाने की इच्छा और तेज हो जाए.
ब्लिस पॉइंट: लत लगाने का विज्ञान
इसके बाद आता है ब्लिस पॉइंट, यानी फैट, शुगर और सॉल्ट का ऐसा परफेक्ट बैलेंस, जो आपकी सेंसरी सिस्टम को सीधा निशाना बनाता है. जैसे ही आप पहला चिप्स मुंह में रखते हैं, स्वाद इतना संतुलित होता है कि दिमाग कहता है बस एक और. यही वजह है कि एक पैकेट हाथ में लिया तो पूरा खत्म करके ही छोड़ते हैं.
टेस्ट नहीं, टेस्ट की लत
पैकेज्ड फूड का स्वाद सिर्फ अच्छा नहीं होता, उसे एडिक्टिव बनाया जाता है. इसके लिए टेस्ट इनहैंसर, फ्लेवर बूस्टर और कई तरह के केमिकल्स का इस्तेमाल होता है. फूड साइंटिस्ट इन सबका ऐसा संतुलन बनाते हैं कि आपका दिमाग बार-बार उसी स्वाद की मांग करे. यह भूख नहीं, बल्कि क्रेविंग होती है, जो असली खाने से नहीं, बल्कि मैनिपुलेशन से पैदा होती है.
खुशबू और साइकोलॉजी का खेल
अगर आपको नूडल्स खाने का मन नहीं भी है, लेकिन सामने नूडल्स बन रहे हों, तो उनकी खुशबू सूंघते ही मन बदल जाता है. यह भी एक तरह का साइकोलॉजिकल ट्रिगर है. खुशबू सीधे दिमाग के उस हिस्से को एक्टिव करती है जो भूख और यादों से जुड़ा होता है.
वैनिशिंग कैलोरिक डेंसिटी: खाया भी, नहीं भी
जो चीज बॉल्स आप खाते हैं, जीभ पर रखते ही पिघल जाती हैं. इसे कहा जाता है वैनिशिंग कैलोरिक डेंसिटी. आप पूरा पैकेट खत्म कर लेते हैं, लेकिन दिमाग को लगता है किकुछ खास खाया ही नहीं. नतीजा आप दूसरा पैकेट उठा लेते हैं. कैलोरी अंदर जाती रहती है पर सैटिस्फैक्शन नहीं आता.
यह स्वाद नहीं, रणनीति है
पैकेज्ड फूड बेचने के लिए कंपनियां साइंस, साइकोलॉजी और स्ट्रेटजी तीनों का इस्तेमाल करती हैं. यह सिर्फ खाना नहीं, बल्कि एक पूरी मैनिपुलेशन सिस्टम है. इसलिए अगली बार जब हाथ अपने-आप चिप्स या कोल्ड ड्रिंक की तरफ बढ़े, तो रुककर सोचिए क्या यह आपकी भूख है, या किसी कंपनी की प्लानिंग? जागरूक बनिए, लेबल पढ़िए और जितना हो सके असली, सादा खाना चुनिए. यही सबसे बड़ा बचाव है.
(रिपोर्ट : आदित्य झा)
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)














