Ultra- Processed Food: देर रात टीवी देखते हुए आप जो स्नैक खा रहे हैं, वह शायद शो से भी ज़्यादा सनसनीखेज हो. 2026 की एक नई स्टडी में एक चौंकाने वाला दावा किया गया है: अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (जी हां, आपके चिप्स, इंस्टेंट नूडल्स, फ्रोजन नगेट्स और फ़िज़ी ड्रिंक्स) असली फलों और सब्जियों की बजाय सिगरेट की तरह बिहेव करते हैं. और सच कहें तो, ये तुलना स्वास्थ्य जगत को हैरान कर रही है. ये स्टडी हेल्थकेयर जर्नल Milbank Quarterly में प्रकाशित हुई है. इसके मुताबिक UPFs सिर्फ “खराब खाने की आदत” नहीं हैं, बल्कि ये इंडस्ट्रियल सामग्री से बने ऐसे प्रोडक्ट हैं जिन्हें खास तकनीक से तैयार किया जाता है ताकि उनका स्वाद, शेल्फ लाइफ और मुनाफा बढ़ सके.
तो चलिए जानते हैं कि इस रिसर्च में क्या बताया गया है-
एक्सपर्ट क्यों कर रहे हैं सिगरेट से तुलना?
रिसर्चर्स का कहना है कि जैसे सिगरेट में निकोटिन की मात्रा कंट्रोल तरीके से दी जाती है, वैसे ही इन फूड्स में शुगर, रिफाइंड कार्ब्स और फैट का “परफेक्ट मिक्स” तैयार किया जाता है. यह इतना ज्यादा नहीं होता कि आप तुरंत रुक जाएं, लेकिन इतना जरूर होता है कि आप बार-बार खाने का मन करें.
आज भारत के हर सुपरमार्केट में मिलने वाले पैकेटबंद नमकीन, मीठे अनाज, फ्लेवर्ड ड्रिंक्स, फ्रोजन पिज्जा और रेडी-टू-ईट खाने के बारे में सोचिए. रिसर्चर्स का कहना है कि ये फूड आइटम्स सिगरेट से चौंकाने वाली समानताएं रखते हैं, न केवल स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव के मामले में, बल्कि उनके डिजाइन, मार्केटिंग और सेवन के तरीके में भी.
सेहत के बड़े खतरे जिसे किसी को भी इग्नोर नहीं करना चाहिए?
स्टडी में बताया गया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स का संबंध मोटापा, दिल की बीमारी, कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियों से जुड़ा है. इतना ही नहीं, डिमेंशिया और पार्किंसंस जैसी दिमागी बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है. इनका रोजाना सेवन समय से पहले मौत के जोखिम को भी बढ़ा सकता है. भारत में पहले ही लाइफस्टाइल बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. ऐसे में जंक फूड कल्चर को लेकर चिंता और बढ़ गई है.
क्या इनकी लत सच में लगती है?
वैज्ञानिक इस बात पर बहस कर रहे हैं कि क्या UPFs को नशे जैसी चीज माना जाए. रिसर्च कहती है कि इन फूड्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि पेट भरने के बाद भी खाने का मन करे.
जैसे सिगरेट के साथ होता है. सिगरेट से निकोटीन की नियंत्रित मात्रा मिलती है, उसी तरह यूपीएफ को परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट, फैट और शुगर के "सही" मिश्रण के साथ बनाया गया है. ये इतना तेज नहीं होता कि आप इसे छोड़ दें, लेकिन इतना जरूर होता है कि आपको और खाने की इच्छा हो. चिप्स का वो एक्सट्रा पैकेट? शायद यह सिर्फ आपकी वीक सेल्फ कंट्रोल का नतीजा नहीं है.
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इंडस्ट्री की चालाकियां
स्टडी में पांच रणनीतियों का जिक्र है – सही “डोज” तय करना, दिमाग तक तेजी से असर पहुंचाना, स्वाद को बेहद लुभावना बनाना, हर जगह आसानी से उपलब्ध कराना और समय-समय पर रेसिपी बदलकर खतरे को छिपाना. “लो-फैट”, “डाइट” या “मल्टीग्रेन” जैसे लेबल भी कभी-कभी लोगों को गुमराह कर सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे पहले सिगरेट पर “लाइट” या “माइल्ड” लिखा जाता था.
सरल शब्दों में कहें तो, अनाज, आलू या दूध जैसी नेचुरल सामग्रियों को स्वाद, शेल्फ लाइफ और मुनाफे को बढ़ाने के लिए ज्यादा संसाधित किया जाता है. रिजल्ट? ऐसा भोजन जो पारंपरिक घर के बने भोजन की तुलना में ज्यादा एक्ट्रैक्टिव, आसान और खाने में ऐसा की इसको खाने से खुद को रोका ना जा सके. और यहाँ एक चौंकाने वाला फैक्ट ये भी है कि कुछ मामलों में, इन्हीं बड़ी कंपनियों के तंबाकू और अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड बिजनेस आपस में एक दूसरे से लिंक हैं.
भारत के लिए क्या है सुझाव?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकारों को अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स को तंबाकू की तरह सख्ती से रेगुलेट करने पर विचार करना चाहिए. इसमें बच्चों को टारगेट करने वाले विज्ञापनों पर रोक, ज्यादा टैक्स, साफ चेतावनी लेबल और स्कूलों में बिक्री पर पाबंदी जैसे कदम शामिल हो सकते हैं.
अगली बार जब आप देर रात वेब सीरीज देखते हुए चिप्स का पैकेट खोलें, तो याद रखें - असली ड्रामा शायद स्क्रीन पर नहीं, आपके हाथ में हो सकता है.
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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)














