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Major Abhilasha Barak को मिला UN जेंडर एडवोकेट अवॉर्ड, जानें क्या है यह सम्मान

यूनाइटेड नेशंस मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर अवॉर्ड यूएन सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1325 के तहत शांति अभियानों में लैंगिक समानता और महिला सुरक्षा को बढ़ावा देने वाले सैन्य पीसकीपर्स को दिया जाता है.

Major Abhilasha Barak को मिला UN जेंडर एडवोकेट अवॉर्ड, जानें क्या है यह सम्मान
दुनिया भर में जहां भी अशांति होती है, वहां शांति बहाल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र अपनी सेना भेजता है, जिसे 'पीसकीपिंग फोर्स' कहते हैं.

मेजर अभिलाषा बराक ने संयुक्त राष्ट्र (UN) के मंच पर भारत का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज करा दिया है. वह प्रतिष्ठित यूनाइटेड नेशंस मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर अवॉर्ड' पाने वाली पहली भारतीय महिला पीसकीपर बन गई हैं. यह सम्मान उन्हें लेबनान में संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन (UNIFIL) के दौरान जेंडर इक्वालिटी को बढ़ावा देने और संकटग्रस्त इलाकों में महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा के लिए किए गए उनके अभूतपूर्व कार्यों के लिए दिया गया है.

आइए जानते हैं आखिर यह UN मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर अवॉर्ड क्या है, यह क्यों दिया जाता है और मेजर अभिलाषा बराक को इसके लिए क्यों चुना गया.

क्या है UN मिलिट्री जेंडर एडवोकेट अवॉर्ड?

इस अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र द्वारा साल 2016 में की गई थी. यह सम्मान हर साल दुनिया भर के उन मिलिट्री पीसमेकर (Military Peacekeepers) को दिया जाता है, जो किसी भी देश में तैनाती के दौरान लैंगिक समानता को बढ़ावा देते हैं और महिलाओं के अधिकारों व सुरक्षा के लिए असाधारण काम करते हैं.

यह अवॉर्ड मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1325 के सिद्धांतों पर आधारित है.

प्रस्ताव 1325 क्या है?

अक्टूबर 2000 में पारित इस ऐतिहासिक प्रस्ताव का उद्देश्य दुनिया के युद्ध या संघर्ष वाले इलाकों में शांति स्थापना, सुरक्षा और बातचीत की प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना है. यह प्रस्ताव इस बात पर जोर देता है कि युद्ध का सबसे बुरा असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है, इसलिए शांति अभियानों में भी महिलाओं की भूमिका सबसे अहम होनी चाहिए.

मेजर अभिलाषा बराक को क्यों मिला यह सम्मान?

लेबनान में भारतीय बटालियन के साथ 'एंगेजमेंट टीम कमांडर' और 'जेंडर फोकल पॉइंट' के रूप में तैनात मेजर बराक ने केवल 6 महीनों में जेंडर से जुड़ी 539 फील्ड गतिविधियां कीं, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और स्किल डेवलपमेंट के कार्यक्रमों के जरिए उन्होंने 5,000 से अधिक स्थानीय महिलाओं और बच्चियों का जीवन बदला. इसके अलावा इलाके में तनाव और सुरक्षा जोखिम बढ़ने के समय उन्होंने पूरी तरह से महिलाओं वाली पेट्रोल टीमों का नेतृत्व किया, जिससे स्थानीय महिलाओं में सुरक्षा की भावना पैदा हुई.

उन्होंने एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित प्लेटफॉर्म शुरू करने में बड़ी भूमिका निभाई. साथ ही उन्होंने दक्षिणी लेबनान की 75 महिलाओं को भारत सरकार के पूरी तरह से फंडेड 'इंडियन टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन' (ITEC) प्रोग्राम के तहत स्कॉलरशिप दिलाई, जिससे वे रिन्यूएबल एनर्जी और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन रही हैं.

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