West Bengal Election : आज पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों पर पूरे देश की नजर टिकी है. अब तक के रुझानों में बीजेपी को बंगाल में बड़ी बढ़त मिलती दिख रही है और बहुमत का आंकड़ा पार हो चुका है. पिछले कुछ सालों में राज्य की राजनीति में बीजेपी ने अपनी स्थिति काफी मजबूत की है. लेकिन अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है. एक समय ऐसा था, जब बीजेपी और टीएमसी दोनों पार्टियां राज्य की राजनीति में मौजूद ही नहीं थीं. उस दौर में इंडियन नेशनल कांग्रेस का दबदबा इतना मजबूत था कि उसे ही सत्ता का पर्याय माना जाता था. हालांकि, बाद के सालों में वामपंथी राजनीति उभरी और लंबे समय तक सत्ता पर काबिज रही, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों ही हाशिए पर पहुंच चुके हैं. इसी बदलती चुनावी राजनीति की शुरुआत 1952 के पहले चुनाव से होती है, जब पहली बार जनता ने अपनी सरकार चुनी थी.
1952 का चुनाव, जिसने तय की पहली सरकार
1951-52 में देशभर में हुए पहले आम चुनाव के साथ ही पश्चिम बंगाल में भी पहली बार विधानसभा चुनाव कराया गया. 31 मार्च 1952 को हुए इस चुनाव में जनता ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. इस चुनाव में कुल 238 सीटों के लिए मतदान हुआ, जो 196 निर्वाचन क्षेत्रों में बंटी थीं. इनमें कई डबल-मेंबर निर्वाचन क्षेत्र भी शामिल थे, जहां से दो प्रतिनिधि चुने जाते थे. यह चुनाव इसलिए भी खास था क्योंकि पहली बार आम लोगों को अपनी सरकार चुनने का पूरा अधिकार मिला था. उस समय विभाजन के बाद की स्थिति, शरणार्थियों का दबाव और आर्थिक चुनौतियां राज्य के सामने थीं. ऐसे में यह चुनाव केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी बेहद अहम था.
कांग्रेस की जीत और पहली सरकार का गठन
पहले चुनाव में तस्वीर बिल्कुल साफ थी. जीत का सेहरा कांग्रेस के सिर पर बंधा था. इंडियन नेशनल कांग्रेस ने करीब 150 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया और राज्य में पहली निर्वाचित सरकार बनाई. दूसरी ओर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया 28 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष के रूप में उभरी. उस समय वामपंथी राजनीति अपनी जड़ें जमा रही थी, लेकिन सत्ता तक पहुंचने में उसे अभी वक्त लगना था.
डॉ. बिधान चंद्र रॉय का नेतृत्व
कांग्रेस की इस ऐतिहासिक जीत के बाद राज्य की कमान संभाली डॉ. बिधान चंद्र रॉय ने. डॉ. बिधान चंद्र रॉय पहले से अंतरिम सरकार के मुख्यमंत्री थे, लेकिन 1952 के चुनाव के बाद उनकी स्थिति और मजबूत हो गई. उनके कार्यकाल में हेल्थ, इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्बन डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में कई अहम कदम उठाए गए, जिसने पश्चिम बंगाल के विकास की नींव रखी. 1952 का यह चुनाव सिर्फ एक सरकार के गठन तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने पश्चिम बंगाल की राजनीति का भविष्य तय कर दिया. इसी दौर में विपक्ष के रूप में वामपंथी दलों की पहचान बनी, जो आगे चलकर लंबे समय तक सत्ता में भी रहे.
कांग्रेस से लेफ्ट और फिर TMC तक का सफर
1952 में शुरू हुआ कांग्रेस का दबदबा 1967 तक चला, जब पहली बार राज्य में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. ये कई दलों के सहयोग से बनी यूनाइटेड फ्रंट की सरकार थी. लेकिन ये सरकार स्थिर साबित नहीं हुई. बाद में इस राजनीतिक अस्थिरता के बीच असली बदलाव 1977 में आया, जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट सत्ता में आया और ज्योति बसु के नेतृत्व में तीन दशक से ज्यादा समय तक शासन करता रहा. लेकिन 2011 में यह सिलसिला टूटा, जब TMC की नेता ममता बनर्जी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर लेफ्ट के लंबे वर्चस्व को खत्म कर दिया.
आज जब एक बार फिर पश्चिम बंगाल चुनावी नतीजों के साथ नए राजनीतिक अध्याय की ओर बढ़ रहा है, तब 1952 की यह कहानी याद दिलाती है कि इस राज्य की सियासत हमेशा बदलाव, संघर्ष और जनता के फैसलों से ही आकार लेती रही है.
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