विज्ञापन

युवा पीढ़ी के संस्कार और शिक्षा पर मोहन भागवत का जोर, 1,296 ग्रामीण विद्यालयों का किया जिक्र

RSS 100 Years Education Network Vidya Bharti: आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने ग्रामीण विद्यालयों में स्वयंसेवकों के काम का जिक्र किया. 1952 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में पहले सरस्वी शिशु मंदिर की स्थापना हुई, इसके बाद आज ये नेटवर्क लगातार बड़ा हो रहा है.

युवा पीढ़ी के संस्कार और शिक्षा पर मोहन भागवत का जोर, 1,296 ग्रामीण विद्यालयों का किया जिक्र
मोहन भागवत ने किया संघ के एजुकेशन सिस्टम का जिक्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी स्थापना के 100 साल पूरे कर 101वें साल में प्रवेश कर चुका है. एक सदी के इस सफर में संघ ने शाखाओं के विस्तार के साथ-साथ अपने आनुषंगिक संगठनों के जरिए शिक्षा और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाई है. जहां शाखाओं के माध्यम से स्वयंसेवकों को जोड़ने का प्रयास किया जाता है, वहीं विद्या भारती जैसे संगठनों के जरिए विद्यालयों में शिक्षा और संस्कार पर जोर दिया जाता है. विजयादशमी के अवसर पर संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने ग्रामीण विद्यालयों में स्वयंसेवकों के प्रयासों का जिक्र किया. 

ग्रामीण शिक्षा में स्वयंसेवकों की भूमिका

RSS का दावा है कि स्वयंसेवकों और ग्रामवासियों के संयुक्त प्रयासों से ग्रामीण स्कूलों की शिक्षा गुणवत्ता, विद्यार्थियों की उपस्थिति और अभिभावकों की सहभागिता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है.  विजयादशमी के अवसर पर डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि स्वयंसेवक समाज में सामाजिक उद्यम खड़ा करने का प्रयास करते हैं. उन्होंने ग्रामीण विद्यालयों में स्वयंसेवकों के अनुभव को उत्साहवर्धक बताया.

संघ प्रमुख के मुताबिक, 21 प्रांतों के 210 जिलों में लगभग 1,296 विद्यालयों में देखा गया कि जहां ग्रामीणों की भागीदारी और स्वयंसेवकों का सहयोग रहा, वहां विद्यार्थियों की उपस्थिति, सीखने के स्तर और अभिभावकों की सहभागिता में सुधार आया. ग्रामीण शिक्षा में स्वयंसेवकों की इस भूमिका को समझने के लिए संघ से जुड़े शैक्षणिक संगठन विद्या भारती के विकास और उसके विस्तार को जानना भी जरूरी है. इसी संगठन के माध्यम से संघ ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सबसे व्यापक उपस्थिति दर्ज कराई है.

1952 में शुरुआत, आज देशभर में विद्यालयों का नेटवर्क

संघ से जुड़े शैक्षणिक संगठन विद्या भारती की शुरुआत 1952 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में पहले सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना से हुई. साल 1958 में क्षेत्रीय स्तर पर शिक्षा समितियों का गठन हुआ, जबकि 1977 में इसे अखिल भारतीय स्तर पर संगठित स्वरूप मिला. विद्या भारती के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इसके अंतर्गत लगभग 25,445 शैक्षणिक संस्थान हैं, जिनमें करीब 34.95 लाख विद्यार्थी पढ़ते हैं और लगभग 1.61 लाख शिक्षक कार्यरत हैं.

इसके विद्यालयों में शिशुवाटिका, सरस्वती शिशु मंदिर, सरस्वती विद्या मंदिर, प्राथमिक से लेकर उच्च माध्यमिक विद्यालय और संस्कार केंद्र शामिल हैं. अधिकांश विद्यालय CBSE या संबंधित राज्य शिक्षा बोर्डों से संबद्ध हैं.

शिक्षा के जरिए वैचारिक विस्तार

संघ और विद्या भारती का कहना रहा है कि शिक्षा के साथ भारतीय संस्कृति और संस्कारों को भी महत्व दिया जाना चाहिए. संघ की शैक्षणिक पहल को उसकी वैचारिक सोच से भी जोड़कर देखा जाता है. भारतीय शिक्षा व्यवस्था में वामपंथी विचारों के प्रभाव को लेकर संघ की आलोचनाओं के बीच अपने शैक्षणिक संस्थानों का नेटवर्क खड़ा करना उसकी एक महत्वपूर्ण रणनीति रही है. इन विद्यालयों में अलग-अलग सामाजिक और धार्मिक पृष्ठभूमियों के विद्यार्थी भी पढ़ते हैं. 

विद्यालयों में संघ के प्रशिक्षण शिविर

विद्या भारती के विद्यालयों में शैक्षणिक गतिविधियों के अलावा संघ के कुछ प्रशिक्षण शिविर और संगठनात्मक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं. ये शिविर अक्सर गर्मी और सर्दी की छुट्टियों के दौरान लगाए जाते हैं. इनमें शारीरिक प्रशिक्षण, बौद्धिक गतिविधियों और संगठनात्मक कार्यों पर जोर दिया जाता है. इस तरह विद्यालयों का नेटवर्क संघ की शैक्षणिक और संगठनात्मक गतिविधियों के बीच एक कड़ी भी बनता है.

युवाओं को जोड़ने और नेतृत्व तैयार करने पर जोर

संघ की शाखाओं में खेल, शारीरिक अभ्यास, बौद्धिक चर्चा और सामूहिक गतिविधियों के जरिए युवाओं को जोड़ने का प्रयास किया जाता है. दिल्ली में शाखाओं में पहुंचने वाले विद्यार्थियों ने बातचीत में बताया कि इन गतिविधियों से उन्हें विभिन्न विषयों को समझने का अवसर मिलता है.

स्थानीय और जिला इकाइयों में युवा स्वयंसेवकों को जिम्मेदारियां देना भी संगठन की कार्यप्रणाली का हिस्सा है. शाखाओं की नियमित गतिविधियों में विद्यार्थियों और युवाओं की भागीदारी के जरिए भविष्य का नेतृत्व तैयार करने की कोशिश की जाती है. संघ की इसी नेतृत्व निर्माण प्रक्रिया से कई कार्यकर्ता संगठन के शीर्ष पदों तक पहुंचे हैं. डॉ. मोहन भागवत का संगठनात्मक सफर भी संघ के भीतर युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की इसी परंपरा का एक प्रमुख उदाहरण माना जाता है.

मोहन भागवत का सफर भी युवा नेतृत्व की मिसाल

संघ में नेतृत्व परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव साल 2000 में आया, जब करीब 50 साल की उम्र में डॉ. मोहन भागवत को सरकार्यवाह के रूप में निर्वाचित किया गया. वहीं साल 2009 में डॉ. भागवत संघ के सरसंघचालक बने. संघ की सौ वर्षों की यात्रा में शिक्षा के क्षेत्र में संस्थानों का विस्तार और युवाओं को संगठन से जोड़ने के प्रयास उसकी दीर्घकालिक रणनीति के अहम हिस्से रहे हैं. हालांकि, इन प्रयासों के प्रभाव को समझने के लिए विद्यालयों की संख्या के साथ-साथ शिक्षा की गुणवत्ता, विद्यार्थियों के सीखने के परिणाम और सामाजिक समावेश जैसे पहलुओं का स्वतंत्र आकलन भी जरूरी है.

यह भी पढ़ें | Live: आंदोलन समस्या का समाधान नहीं, इसके पीछे निहित स्वार्थ के लोग- विजयादशमी समारोह में बोले भागवत

यह भी पढ़ें | दशहरे पर रावण के साथ खड़े दो लोग कौन होते हैं? जिनका हर बार जलाया जाता है पुतला

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
RSS 100 Years Celebration, RSS 100 Years, Vidya Bharti Akhil Bharatiya Shiksha Sansthan, Mohan Bhagwat
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com