सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे मशहूर ऐतिहासिक धरोहरों में से एक 'डांसिंग गर्ल' की मूर्ति को लेकर छिड़े विवाद के बीच NCERT डायरेक्टर दिनेश प्रसाद सकलानी ने अपनी सफाई पेश की है. उन्होंने कक्षा 9वीं की नई पाठ्यपुस्तक में इस प्राचीन मूर्ति की बदली हुई तस्वीर छपने पर एनडीटीवी से हुई बातचीत में कहा, "शरीर के ऊपरी हिस्से को छिपाने के पीछे कोई खास वजह नहीं है. यह मामला कला और शिक्षा विभाग को भेजा गया है, जो पाठ्यपुस्तक तैयार करने के लिए जिम्मेदार है. आप संबंधित पाठ्यपुस्तक विकास टीम के सदस्यों से भी संपर्क कर सकते हैं."
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद कक्षा 9 की कला शिक्षा (Art Education) की नई किताब 'मधुरिमा' से शुरू हुआ है. इस किताब के पहले चैप्टर "कला का इतिहास" में मोहनजो-दड़ो से मिली इस ऐतिहासिक कांस्य (bronze) मूर्ति की फोटो दी गई है. असली मूर्ति में शरीर का ऊपरी हिस्सा खुला हुआ है. लेकिन नई किताब में छपी तस्वीर में कंधों से नीचे के हिस्से को इस तरह छायादार (शेड) किया गया है, जिससे ऐसा लगता है जैसे मूर्ति ने कपड़े पहने हुए हों.
इस बदलाव के कारण मूर्ति की मूल शारीरिक बनावट अब ठीक से दिखाई नहीं दे रही है. इसी को लेकर देश के बड़े इतिहासकारों, जानकारों और शिक्षाविदों के बीच एक नई बहस छिड़ गई.
क्यों खास है 'डांसिंग गर्ल'?
लगभग 4,000 साल पुरानी यह मूर्ति सिंधु घाटी सभ्यता की बेहतरीन कलाकारी और इतिहास का प्रतीक है. पूरी दुनिया की इतिहास और पुरातत्व (archaeology) की किताबों में इसे इसके मूल रूप में ही दिखाया जाता है. ऐसे में देश की सबसे बड़ी शिक्षा संस्था की किताब में हुए इस बदलाव ने हर किसी को हैरान कर दिया है. पुरातत्वविद् लंबे समय से इस मूर्ति को सभ्यता की धातु विज्ञान (मेटलर्जी) की उन्नत जानकारी के सबूत के तौर पर देखते रहे हैं. बता दें कि असली मूर्ति नई दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में रखी है.
बता दें कि मोहनजो-दड़ो में मिली लगभग चार इंच ऊंची "डांसिंग गर्ल" की मूर्ति एक यंग लड़की को दर्शाती है, जिसने बाल जूड़ा बनाया हुआ है. साथ ही उसने चूड़ियां, ब्रेसलेट और हार पहना हुआ है. उसके आत्मविश्वास भरे अंदाज और बेहतरीन कारीगरी ने उसे हड़प्पा सभ्यता की पहचान बन चुकी चीजों में से एक बना दिया है.
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