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50 लाख से लेकर 1 करोड़ तक की फीस, डीम्ड यूनिवर्सिटी से MBBS करना कितना महंगा?

Deemed Universities: देशभर में 800 से ज्यादा मेडिकल सीटों के खाली रहने की खबर ने सभी को हैरान कर दिया है. हालांकि ये ज्यादातर डीम्ड यूनिवर्सिटीज की सीटें हैं, जहां मेडिकल की फीस काफी ज्यादा होती है.

50 लाख से लेकर 1 करोड़ तक की फीस, डीम्ड यूनिवर्सिटी से MBBS करना कितना महंगा?
डीम्ड यूनिवर्सिटीज में एक सीट के लिए लाखों रुपये की फीस

मेडिकल की एक सीट के लिए जहां जमकर मारामारी होती है, वहीं देशभर में MBBS की 800 सीटें खाली छूट गईं. देशभर में खाली 837 सीटों में से 824 तमिलनाडु और पुडुचेरी से हैं. ये तमाम सीटें किसी सरकारी कॉलेज की नहीं, बल्कि डीम्ड यूनिवर्सिटीज की हैं, जहां NEET पास छात्रों ने एडमिशन ही नहीं लिया. इसका कारण इन यूनिवर्सिटीज में लगने वाली भारी भरकम फीस को माना जा रहा है. यहां पढ़ने के लिए 50 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये तक की फीस देनी होती है. ऐसे में आज जानेंगे कि डीम्ड यूनिवर्सिटीज क्या हैं और इनमें एडमिशन लेना कितना मुश्किल होता है. 

क्या होती हैं डीम्ड यूनिवर्सिटीज?

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) की तरफ से इस तरह की यूनिवर्सिटीज को मान्यता दी जाती है. यूजीसी अधिनियम, 1956 की धारा 3 के तहत डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी का दर्जा मिलता है. नीट क्रैक करने के बाद ये यूनिवर्सिटी छात्रों को एडमिशन दे सकती हैं. इस तरह की यूनिवर्सिटीज को अपना कोर्स, अपनी डिग्री और परीक्षा आयोजित करने का अधिकार होता है. MCC की ऑल इंडिया काउंसलिंग से यहां एडमिशन होते हैं. 

कितनी होती है फीस?

डीम्ड यूनिवर्सिटी की फीस उनके हिसाब से कम या ज्यादा हो सकती है. ज्यादातर राज्यों में इन पर कोई कैपिंग नहीं है, ऐसे में एक मेडिकल सीट के लिए कहीं 50 लाख रुपये लगते हैं तो कहीं ये 90 लाख या फिर एक करोड़ तक पहुंच जाती है. यही वजह है कि मिडिल क्लास परिवार से आने वाले छात्र यहां एडमिशन नहीं ले पाते हैं. हालांकि ये यूनिवर्सिटीज छात्रों को कई तरह के एक्सपोजर देने का काम करती हैं और यहां प्राइवेट कॉलेजों की तरह तमाम चीजों व्यवस्था रहती है. आमतौर पर यहां एडमिशन लेने वाले छात्र वो होते हैं, जिनकी NEET UG में अच्छी रैंक नहीं आ पाती है और सरकारी सीट नहीं मिल पाती है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

डीम्ड यूनिवर्सिटीज की मोटी फीस को लेकर एक्सपर्ट्स लगातार सवाल उठाते रहे हैं. उनका कहना है कि इसमें सबसे ज्यादा नुकसान उन गरीब छात्रों का होता है, जो अच्छी रैंक तो लाते हैं, लेकिन सरकारी कॉलेज नहीं मिल पाता. इसके बाद वो इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं कि किसी प्राइवेट या फिर डीम्ड यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लें. उनकी जगह ये सीटें अमीर घर से आने वाले उन छात्रों को आसानी से मिल जाती हैं, जिनकी नीट में रैंक काफी पीछे थी. 

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