Section 138 NI Act : आजकल के दौर में पैसों का लेन-देन आम बात है. अक्सर लोग नकद की जगह चेक से पेमेंट करना पसंद करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर आपका दिया हुआ चेक बैंक में जाकर 'बाउंस' हो जाए, तो आप बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं? जी हां, चेक बाउंस होना सिर्फ एक बैंकिंग समस्या नहीं है, बल्कि यह एक क्रिमिनल ऑफेंस है. इसी को लेकर हमारी बातचीत हुई सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट आरुषी कुलश्रेष्ठ से जिन्होंने धारा 138 के बारे में विस्तार से बताया है, तो बिना देर किए आइए जानते हैं..
आखिर कब फंसते हैं आप धारा 138 के चक्कर में?
आरुषि के मुताबिक, जब आप किसी कानूनी कर्ज या जिम्मेदारी को चुकाने के लिए चेक देते हैं और वह बैंक से रिजेक्ट हो जाता है, तो कानून हरकत में आता है. इसके कई कारण हो सकते हैं-
- खाते में बैलेंस कम होना (Inadequate Funds).
- आपने अपना बैंक खाता ही बंद कर दिया हो.
- चेक काटने के बाद खुद बैंक को पेमेंट रोकने (Stop Payment) का निर्देश देना.
- इन स्थितियों में बैंक आपको एक 'रिटर्न मेमो' देता है, जिसमें चेक रिजेक्ट होने की वजह लिखी होती है. यहीं से कानूनी प्रक्रिया शुरू होती है.
क्या हो सकती है सजा?
जेल की सजाआपको अधिकतम 2 साल तक की जेल हो सकती है.
भारी जुर्मानाचेक पर जितनी रकम लिखी थी, कोर्ट उसका दोगुना (Double) तक जुर्माना लगा सकता है.
कई मामलों में कोर्ट जेल और जुर्माना दोनों की सजा एक साथ सुना सकता है.
स्टेप-बाय-स्टेप समझें पूरी कानूनी प्रक्रिया
लीगल नोटिस है सबसे जरूरीचेक बाउंस होने का मेमो मिलने के 30 दिनों के भीतर पीड़ित व्यक्ति (जिसे पैसे मिलने थे) को आपको एक कानूनी नोटिस भेजना होगा. इसमें आपको 15 दिनों का समय दिया जाता है कि पैसे देने के लिए. अगर आप इन 15 दिनों में पैसे दे देते हैं, तो मामला यहीं खत्म हो जाता है.
कोर्ट में शिकायतअगर 15 दिन बीतने के बाद भी आपने पैसे नहीं दिए, तो सामने वाला व्यक्ति नोटिस की अवधि खत्म होने के 1 महीने के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दर्ज कर सकता है.
समन और पेशी
अदालत दस्तावेज देखने के बाद आरोपी को समन भेजती है. आरोपी को कोर्ट में आकर अपनी बात रखनी होती है. वह या तो अपनी गलती मान सकता है या मुकदमा लड़ सकता है.
सबूत और बहस
इसके बाद ट्रायल शुरू होता है. दोनों पक्ष अपने-अपने गवाह और दस्तावेज (जैसे बैंक रिकॉर्ड) पेश करते हैं. अंत में जज साहब दोनों पक्षों की बहस सुनकर अपना फैसला सुनाते हैं. जिसमे अदालत साबूतों के आधार पर दोषी ठहरा सकते हैं (जेल + जुर्माना/मुआवजा),
या आरोपी को बरी कर सकती है.
बड़े या हाई-प्रोफाइल मामलों में, या जब बार-बार भुगतान नहीं किया जाता, तो अदालत सख्त रुख अपना सकती है और तुरंत आत्मसमर्पण (surrender) का आदेश दे सकती है, जैसा कि हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने राजपाल यादव मामले में किया.
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