पिछले कुछ सालों से दुनिया में लगातार युद्ध की खबरों ने सभी को परेशान किया है. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया है, जिसके बाद मिडिल ईस्ट देशों में हालात काफी बिगड़ रहे हैं. ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की हत्या के बाद अब ईरान लगातार उन देशों पर हमले कर रहा है, जहां अमेरिका ने अपने बेस बनाए हैं. युद्ध में कई लोग मारे जाते हैं, लेकिन जो जिंदा बचते हैं, उनकी मानसिक स्थिति भी ऐसी हो जाती है कि वो लंबे वक्त तक परेशान रहते हैं. ऐसी खबरों को देखने वाले लोगों के दिमाग पर भी इसका असर पड़ता है. ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि बोर्ड परीक्षा देने वाले छात्रों के लिए इस तरह के हालात कितने मुश्किल हैं और उनके दिमाग पर इसका क्या असर पड़ सकता है.
एक्सपर्ट ने बताया कारण और इलाज
इस मामले को समझने के लिए हमने साइकोलॉजिस्ट (मनोवैज्ञानिक) डॉक्टर त्रिदीप कुमार चौधरी और डॉ. मालिनी सबा से बात की. जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे युद्ध लोगों के दिमाग पर असर करता है और ये कितना खतरनाक हो सकता है. साथ ही उन्होंने इससे बचने का भी तरीका बताया.
दिमाग पर क्या असर पड़ता है?
डॉक्टर चौधरी ने बताया कि हिंसा और ब्लास्ट जैसी चीजों को देखने पर ट्रॉमा हो सकता है. ये दो तरह का होता है... पहला उन लोगों के साथ रहता है, जो डायरेक्ट इसके संपर्क में आते हैं. यानी आप उस जगह पर हैं, जहां ये सब हो रहा है. इसे डायरेक्ट एक्सपोजर कहा जाता है. वहीं दूसरे वो लोग होते हैं, जो इस तरह की खबरों को सोशल मीडिया और टीवी के जरिए देखते हैं. ये ट्रॉमा का इनडायरेक्ट एक्सपोजर होता है.
बचने के लिए क्या करें?
जब हमने साइकोलॉजिस्ट से पूछा कि इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए, तो उन्होंने बताया कि पेरेंट्स को इस वक्त सबसे अहम रोल निभाना चाहिए. हमें बच्चों को गार्ड करना चाहिए और देखना चाहिए कि कहीं वो हिंसा या फिर हमलों की खबरें ज्यादा तो नहीं देख रहे हैं. अगर ऐसा कोई बच्चा है, जो इस तरह की चीजें ज्यादा देख रहा है तो जरूरी है कि उसे किसी दूसरी एक्टिविटी में बिजी रखें. पूरा दिन पढ़ने से भी छात्र बोर हो जाते हैं, ऐसे में उन्हें फिजिकल एक्टिविटीज और उनकी पसंद के काम करने दें. इससे वो युद्ध जैसी खबरों से दूर रहेंगे और उनके दिमाग पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
डॉक्टर ने बताया क्या हो सकते हैं नुकसान
मनोवैज्ञानिक और मानव एवं सामाजिक अधिकार कार्यकर्ता डॉ. मालिनी सबा ने इस पर कहा, युद्ध की खबरें और सोशल मीडिया पर लगातार दिखने वाली हिंसक तस्वीरें छात्रों के मन पर गहरा प्रभाव डाल सकती हैं, खासतौर पर तब जब वे बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हों. इस उम्र में मन संवेदनशील होता है, बार-बार नकारात्मक समाचार देखने से डिप्रेशन, असुरक्षा और भविष्य को लेकर चिंता पैदा हो सकती है. इससे फोकस कम होता है और आत्मविश्वास कमजोर पड़ सकता है.
मेंटल हेल्थ के लिए खतरनाक है युद्ध
युद्ध कई लोगों की जिंदगी को हमेशा के लिए बदलकर रख देता है. इससे लोगों में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) देखा जाता है. ये एक ऐसा ट्रॉमा होता है, जिससे बाहर निकलना लगभग नामुमकिन हो जाता है. रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर कई ऐसी रिपोर्ट्स सामने आई थीं. एक स्टडी में बताया गया था कि 16% युवाओं में PTSD (पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) के लक्षण देखे गए. इनमें 10% से ज्यादा किशोरों ने गंभीर अवसाद (डिप्रेशन) का अनुभव किया. इसके अलावा युद्ध के इस ट्रॉमा से जूझ रहे कई लोगों ने सुसाइड किए या फिर खुद की जान लेने की भी कोशिश की.
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