Bihar Degree Colleges: बिहार में डिग्री कॉलेज को यूनिवर्सिटी से अलग करने का सरकार का प्लान ठंडा बस्ते में जाता हुआ दिखाई दे रहा है. भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के विधान पार्षदों ने इस प्रस्ताव के विरोध में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को चिट्ठी लिखी है. दरअसल बिहार सरकार बिहार के सभी डिग्री कॉलेज को विश्वविद्यालय के नियंत्रण से मुक्त कर सीधे उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत संचालित करने के लिए एक कानून बनाने वाली थी. इससे राज्यपाल की शक्तियां भी प्रभावित होती. हालांकि इस बारे में उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारी आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कह रहे लेकिन सूत्रों के मुताबिक सरकार इसी सत्र में यह बिल लाने पर विचार कर रही थी. लेकिन अब अपने ही खेमे में उठ रहे विरोध के स्वरों के कारण बिल ठंडे बस्ते में डाला जा सकता है.
क्या प्रस्ताव थे नए बिल में?
फिलहाल बिहार में नवसृजित 211 डिग्री कॉलेज एवं पूर्व से संचालित अंगीभूत कॉलेज पर विश्वविद्यालय का प्रशासनिक नियंत्रण होता है. नए प्रस्ताव के मुताबिक कॉलेज पर विभाग का पूरा नियंत्रण होता. शिक्षकों को राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने की छूट नहीं मिलती. उच्च शिक्षा अधिकारी के नियुक्ति का भी प्रस्ताव शामिल था. साथ ही नियुक्तियों के लिए भी कई बदलाव किए जाने थे. जिनमें पीएचडी की अनिवार्यता भी समाप्त हो जाती.
बीजेपी-जेडीयू के विधान पार्षदों ने ही जताया विरोध
विधान पार्षद संजीव कुमार सिंह, नवल किशोर यादव, संजय सिंह समेत अन्य सदस्यों ने मुख्यमंत्री पर चिट्ठी लिखकर प्रस्ताव पर पुनर्विचार को कहा. पत्र में कहा गया है कि वर्तमान व्यवस्था में विश्वविद्यालय स्नातक, स्नातकोत्तर और शोध कार्यक्रमों के बीच शैक्षणिक निरंतरता बनाए रखते हैं. पाठ्यक्रम, परीक्षा, शोध और गुणवत्ता नियंत्रण का पूरा ढांचा एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है. यदि महाविद्यालय अलग प्रशासनिक ढांचे में चले जाते हैं तो यह समन्वय कमजोर होगा और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
पार्षदों ने की सभी स्टेकहोल्डर से सुझाव लेने की मांग
चिट्ठी में विधान पार्षदों ने 3 प्रमुख मांगें रखी हैं -
- विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, छात्र संगठनों, शिक्षाविदों और अन्य सभी हितधारकों से व्यापक परामर्श किए बिना किसी भी विधेयक को अंतिम रूप नहीं दिया जाए.
- बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों का मसौदा सार्वजनिक पोर्टल पर जारी कर विशेषज्ञों और आम नागरिकों से सुझाव लिए जाएं.
- विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक संरचना और शैक्षणिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखते हुए ही किसी नई व्यवस्था पर निर्णय लिया जाए.
एनडीटीवी को सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक सत्र से पहले हुए कैबिनेट बैठक का पहला एजेंडा भी यही बिल था लेकिन यह पास नहीं हो सका. इसलिए कैबिनेट के प्रेस नोट की शुरुआत दूसरे एजेंडे से हुई.
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