खास बातें
- सालभर उद्योग नकदी संकट से जूझता रहा। कर्ज लेना महंगा हो जाने के कारण डेवलपरों पर कर्ज का बोझ और भी अधिक बढ़ गया।
नई दिल्ली:
देश के रियल्टी उद्योग के लिए वर्ष 2011 निराशाजनक रहा। डेवलपर, खरीदार और निवेशक आर्थिक सुस्ती, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में गिरावट, महंगाई में वृद्धि, शेयर बाजारों में अस्थिरता और ब्याज दरों में वृद्धि जैसी कई तरह की परेशानियों में फंसे रहे।
सालभर उद्योग नकदी संकट से जूझता रहा। कर्ज लेना महंगा हो जाने के कारण डेवलपरों पर कर्ज का बोझ और भी अधिक बढ़ गया। इस साल देश के 11 प्रमुख रियल एस्टेट कम्पनियों पर कुल 38 हजार करोड़ रुपये का कर्ज हो गया, जिसमें से 50 फीसदी से अधिक कर्ज अकेले डीएलएफ पर है।
इसके कारण रियल्टी कम्पनियों ने परियोजनाओं की संख्या घटा दी और गैर प्रमुख सम्पत्तियों को बेचने की रणनीति अपनाई। कुछ कम्पनियों ने जोखिम कम करने के लिए दूसरी कम्पनियों के साथ मिलकर परियोजनाएं शुरू कीं।
आवासीय सम्पत्ति खंड में इस वर्ष ऊंचे मूल्य और अधिक ब्याज दर के कारण बिक्री कम रही। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और मुम्बई में सम्पत्तियों की कीमतें 2008 की तरह ऊंचे स्तर पर पहुंच गई और मार्च 2010 के बाद से ब्याज दरों में भी 12 बार वृद्धि की गई और यह कुल 375 आधार अंक अधिक हो गई।
ग्राहक इस बीच मकानों की कीमतों में गिरावट की उम्मीद में बैठे रहे, लेकिन कम मार्जिन के कारण डेवलपरों ने कीमतें नहीं घटाईं। परिणामस्वरूप बिक्री में गिरावट आई और त्योहारी मौसम में भी कुछ सकारात्मक माहौल नहीं बन पाया।
वर्ष 2010 में बेहतर विकास दिखाने वाले किफायती आवासीय सम्पत्तियों में भी इस वर्ष स्थिति निराशाजनक रही। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में विभिन्न भूमि विवादों के कारण बेहतर कारोबार नहीं हो पाया और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 1.6 लाख मकान अनबिके रह गए।
उद्योग जगत के आंकड़े के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, मुम्बई महानगरीय क्षेत्र, बेंगलुरू, पुणे, हैदराबाद और चेन्नई में करीब 57.6 लाख वर्ग फुट सम्पत्तियों की बिक्री नहीं हो पाई है, जिनकी कीमत लगभग 31 हजार करोड़ रुपये आंकी गई है।
डेवलपरों के सामने मुश्किल यह है कि वह नई परियोजनाओं के एडवांस बुकिंग से पैसे जुटाए या पहले से जारी परियोजनाओं को पूरा करे और बाद में नई परियोजना शुरू करे। कई डेवलपरों ने इस स्थिति में चालू परियोजनाओं को पूरा करना ही बेहतर समझा, जिसके कारण अधिक नई परियोजनाएं शुरू नहीं हो पाईं।
वाणिज्यिक कार्यालय से सम्बंधित सम्पत्तियों में भी देश के सात बड़े शहरों मुम्बई, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे और कोलकाता में मांग से 16.6 करोड़ वर्ग फुट अधिक आपूर्ति देखी गई। जिसके कारण बड़ी संख्या में वाणिज्यिक सम्पत्तियां खाली रहीं।
रिटेल कम्पनियों ने इस स्थिति का पूरा लाभ उठाया और पहली, दूसरी और तीसर श्रेणी के शहरों के सम्भ्रांत इलाकों तथा मॉलों में अपनी उपस्थिति बढ़ाई।
सुधार के मोर्चे पर भी रियल्टी उद्योग के लिए यह साल आशा और निराशाओं भरा रहा। रियल एस्टेट क्षेत्र में इस साल 15 लाख तक के आवासीय ऋणों पर रियायत दी गई, मकानों के पर्यावरण अनुकूल होने की रेटिंग शुरू की गई, सम्पत्ति हस्तांतरण के लिए सेल डीड को अनिवार्य किया गया और राष्ट्रीय विनिर्माण नीति बनाई गई। दूसरी ओर रियल एस्टेट नियामक विधेयक और नये भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास विधेयक को संसद में पेश नहीं किए जा सकने के कारण निराशा हाथ लगी।
रियल्टी क्षेत्र में निवेश में भी कोई उत्साह नहीं देखा गया। इस साल शेयर बाजारों के खराब प्रदर्शन के कारण रियल्टी सूचकांक में काफी अधिक गिरावट देखी गई और कई कम्पनियों ने अपना सार्वजनिक निर्गम लाने की योजना टाल दी।
जानकारों के मुताबिक रियल्टी उद्योग में 2012 की पहली छमाही तक सुस्ती कायम रहेगी और यदि आर्थिक स्थिति में सुधार आती है और सुधार को आगे बढ़ाने लायक राजनीतिक स्थिरता कायम होती है, तो बाद की छमाही में स्थिति बेहतर हो सकती है।
वर्ष 2011 में रियल्टी उद्योग में हुए विकास के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं :
- काले धन के प्रवाह को खत्म करने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए दिल्ली में सर्किल दरें बढ़ाई गईं।
-औद्योगिक रियल एस्टेट में उत्साह के संचार के लिए राष्ट्रीय निवेश और विनिर्माण क्षेत्र।
-सम्पत्ति हस्तांतरण के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सेल डीड अनिवार्य किया गया।
-देश में पहली बार पंचकुला में सिर्फ महिलाओं के लिए आवासीय समिति।
-रियल्टी क्षेत्र का विकास 25-30 फीसदी से घटकर 15 फीसदी हुआ।
-मजबूत स्थिति का लाभ उठाने के कारण डीएलएफ को 630 करोड़ रुपये का जुर्माना, न्यायाधिकरण ने जुर्माने पर रोक लगाई।
-सहारा रियल्टी को निवेशकों को धन वापस करने का आदेश, आदेश को चुनौती।
-कई रियल्टी कम्पनियों ने सार्वजनिक निर्गम लाने की योजना टाल दी।
-सरकार रियल एस्टेट नियामक विधेयक लाने में विफल।
-भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास विधेयक भी पेश नहीं किया गया।