यह ख़बर 15 अक्टूबर, 2012 को प्रकाशित हुई थी

एफडीआई की नीति लागू करने में कानूनी अड़चनें : सुप्रीम कोर्ट

खास बातें

  • सुप्रीम कोर्ट ने खुदरा व्यापार के क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति देने के केन्द्र सरकार के निर्णय पर रोक लगान से सोमवार को इनकार कर दिया। इस मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर को होगी।
नई दिल्ली:

उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने खुदरा व्यापार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति देने के केन्द्र सरकार के निर्णय पर रोक लगान से सोमवार को इनकार कर दिया। इस मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर को होगी।

न्यायमूर्ति आरएम लोढा और न्यायमूर्ति अनिल आर दवे की खंडपीठ ने वकील मनोहर लाल शर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि इस नीति में नियमों की दृष्टि से कुछ दोष है जिसका ‘उपचार’ किया जा सकता है। पीठ ने इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक से विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून के क्रियान्वयन के लिए निर्धारित नियमों में समुचित संशोधन करने को कहा है ताकि सरकार की इस नीति का क्रियान्वयन की छूट दी जा सके।

न्यायालय ने कहा कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने संबंधी अधिसूचना जारी होने से पहले ही विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून (फेमा) के नियमों में संशोधन कर लिया जाना चाहिए था। न्यायालय ने साथ ही स्पष्ट किया कि ‘फेमा’ की नियमावली में संशोधन करके रिजर्व बैंक इस दोष को अब भी दूर कर सकता है।

न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि यह एक ऐसी अनियमितता है जिसमें सुधार किया जा सकता है और नियमों में बदलाव करते ही यह दोष दूर हो जाएगा।’’ न्यायाधीशों ने कहा कि इस अनियमितता के कारण खुदरा व्यापार क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने की नीति पर रोक नहीं लगाई जा सकती है।

अटार्नी जनरल गुलाम वाहनवती ने कहा कि वह फेमा नियमों में संशोधन के लिए तुरंत कदम उठाने के बारे में रिजर्व बैंक के गवर्नर से बात करेंगे। न्यायालय ने अटार्नी जनरल की इस दलील के बाद जनहित याचिका पर सुनवाई पांच नवंबर के लिए स्थगित कर दी।

सरकार की खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने की नीति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका में कहा गया था कि इस नीति को लागू करने के लिए रिजर्व बैंक की अनिवार्य मंजूरी हो इसमें है ही नहीं।

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(इनपुट भाषा से भी)