खास बातें
- भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा है कि बढ़ते राजकोषीय घाटे और लघु अवधि के ऋण का बढ़ता स्तर ‘काफी परेशान’ करने वाला है, लेकिन देश के समक्ष 1991 जैसा भुगतान संकट पैदा नहीं होगा।
नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा है कि बढ़ते राजकोषीय घाटे और लघु अवधि के ऋण का बढ़ता स्तर ‘काफी परेशान’ करने वाला है, लेकिन देश के समक्ष 1991 जैसा भुगतान संकट पैदा नहीं होगा।
रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा कि 1991 का संकट तेल की ऊंची कीमतों की वजह से पैदा हुआ था, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार सूख गया था। यहां भारत के आर्थिक सुधार तथा विकास पर एक चर्चा में सुब्बाराव ने कहा कि बड़ा राजकोषीय घाटा और चालू खाते का घाटा सिस्टम पर दबाव बनाने वाले प्रमुख कारक हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उनके विचारों को सुन रहे थे। सुब्बाराव ने कहा कि 1991 में राजकोषीय घाटा 7 प्रतिशत था। 2012 में यह 5.9 प्रतिशत पर है। इसी तरह चालू खाते का घाटा 3.6 प्रतिशत है, जो 1991 की तुलना में ऊंचा है। वहीं लघु अवधि का ऋण सकल घरेलू उत्पाद का 23.3 प्रतिशत है, जो 1991 में 10.2 प्रतिशत पर था।
सुब्बाराव ने कहा, ‘यह काफी परेशान करने वाली तस्वीर है। लेकिन मैं फिर कहूंगा कि 1991 में स्थिति बिगड़नी निश्चित थी। लेकिन 2012 में ऐसा नहीं होगा।’ उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था का ढांचा बदल चुका है। अब वित्तीय बाजार ज्यादा परिपक्व और विविधता वाले हैं। साथ ही उनमें झटकों को सहने की क्षमता है।