यह ख़बर 01 जनवरी, 2012 को प्रकाशित हुई थी

'पेट्रोलियम पदार्थों के दाम तर्कसंगत बनाने की जरूरत'

खास बातें

  • प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पेट्रोलियम पदार्थों के दाम तर्कसंगत और राजकोषीय स्थिति को मजबूत बनाने पर जोर दिया है।
दिल्ली:

बढ़ते राजकोषीय घाटे और सब्सिडी से चिंतित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पेट्रोलियम पदार्थों के दाम तर्कसंगत और राजकोषीय स्थिति को मजबूत बनाने पर जोर दिया है।
राष्ट्र के नाम नए साल के मौके पर अपने संदेश में मनमोहन सिंह ने कहा, निवेश के विस्तार और ऊर्जा क्षमता बढ़ाने जैसे लक्ष्यों को पाने के लिए पेट्रोलियम क्षेत्र में अधिक युक्तिसंगत मूल्य निर्धारण नीति की जरूरत है तथा घरेलू ईंधन मूल्यों को वैश्विक मूल्यों के साथ जोड़ने की आवश्यकता है। उर्जा वस्तुओं की कीमतों को तर्कसंगत बनाने के बारे में उन्होंने कहा, इसे तत्काल नहीं किया जा सकता, लेकिन हमें इसके लिए चरणबद्ध योजना और बदलाव के लिए उपयुक्त माहौल बनाना होगा। उन्होंने कहा, मैं समझता हूं कि ऐसा करना आसान नहीं होगा लेकिन जब तक हम यह बदलाव हासिल नहीं करते तब तक हम ऊर्जा क्षेत्र में जरूरत के मुताबिक ऊर्जा दक्षता हासिल नहीं कर सकते। इसके बिना हम घरेलू क्षेत्र में ईंधन आपूर्ति के विस्तार के लिए पर्याप्त निवेश आकर्षित करने की स्थिति में भी नहीं होंगे। सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को तो नियंत्रणमुक्त कर दिया है लेकिन डीजल, कैरोसिन और रसोई गैस की कीमतें अभी भी सरकार तय करती हैं और इन पर उसे काफी सब्सिडी भी देनी पड़ती है।
वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने हाल में कहा कि सब्सिडी खर्च करीब एक लाख करोड़ रुपये बढ़ने की संभावना है। वर्ष 2010-11 के बजट में विभिन्न प्रकार की सब्सिडी के लिए 1.32 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है। बहरहाल, कच्चे तेल और उर्वरक की वैश्विक कीमतें बढ़ने से देश में इन उत्पादों पर दी जाने वाली सब्सिडी में भी काफी वृद्धि हुई है। सिंह ने कहा कि राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए भी सब्सिडी कम करना आवश्यक है जो पिछले तीन वर्षों में तेजी से बढ़ी है।
देश के सामने मुख्य चुनौतियों को रेखांकित करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा, हालांकि हमारे लिए अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन से संतुष्ट होने का हर कारण है लेकिन ऐसा निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि भारत अब तीव्र विकास प्रक्रिया की राह पर बगैर किसी दिक्कत के आगे बढ़ने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा, हमारी वृद्धि संभावनाएं वास्तव में बेहतर हैं लेकिन अगर हमें वृद्धि की इस गति को आने वाले वर्षों में भी बनाए रखना है तो हमें कई चुनौतियों का सामना करना होगा। सिंह ने कहा कि 80 के दशक से पहले अर्थव्यवस्था की औसत वार्षिक वृद्धि दर करीब चार प्रतिशत थी और यह वृद्धि दर वर्ष 2004 के बाद से बढ़कर औसतन करीब आठ प्रतिशत हो गई। इसका श्रेय मुख्य रूप से सरकार द्वारा 1991 में शुरू किए गए आर्थिक सुधारों को जाता है।
प्रधानमंत्री ने कहा, आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती गरीबी उन्मूलन, अज्ञानता और बीमारी दूर करना है। हमें वर्ष 2012-13 से शुरू होने वाले 12वीं योजनावधि में इस बुनियादी जिम्मेदारी पर ध्यान केन्द्रित रखने की जरूरत है। दीर्घकालिक तेज विकास हासिल करने के लिए उन्होंने कहा, ‘‘मौजूदा आर्थिक नरमी को रोकना ही काफी नहीं होगा बल्कि इससे कहीं ज्यादा प्रयास करना होगा। हालांकि आर्थिक नरमी को रोकना पहला कदम होगा। हमें दूसरी हरित क्रांति को लाना होगा। तीव्र औद्योगीकरण को अंजाम देने के लिए कई सुधारों को आगे बढ़ाना होगा तथा इसके लिए मजबूत आधारभूत ढांचा खड़ा करना होगा।’’ आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की सरकार की अक्षमता के संदर्भ में मनमोहन सिंह ने कहा, आर्थिक मजबूती के लिए जरूरी आर्थिक सुधारों पर कुछ विवाद हुए और हताशा हुई। इसे समझा जा सकता है लेकिन हमें सुधारों के अपने पिछले अनुभवों से सीखना होगा। आज जिन मामलों में हमें काफी सहुलियत मिली हैं 20 साल पहले उनके लिये भी ऐसे ही विवाद खड़े हुए थे। उन्होंने कहा, हमें याद रखना चाहिए कि विकास के लिए परिवर्तन जरूरी है।

परिवर्तन के लिए आगे बढ़ते समय हमें इसके बुरे प्रभावों से आबादी के कमजोर तबके को बचाना भी होगा, लेकिन हमें बदलाव का आंखमूंदकर विरोध नहीं करना चाहिए। सरकार को अपने घटक दल तृणमूल कांग्रेस और अन्य पार्टियों के विरोध के कारण विदेशी निवेशकों के लिए मल्टी ब्रांड खुदरा क्षेत्र को खोलने तथा पेंशन क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसे महत्वपूर्ण सुधारों से कदम वापस खींचने पड़े।


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