यह ख़बर 18 जून, 2012 को प्रकाशित हुई थी

वित्तीय साख पर अब लगा फिच का बट्टा

खास बातें

  • एस एण्ड पी के बाद वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच ने भी भारत की वित्तीय साख पर लाल घेरा लगा दिया है। फिच ने भ्रष्टाचार, अपर्याप्त सुधार, ऊंची मुद्रास्फीति और वृद्धि दर में गिरावट का हवाला देते हुए कहा है कि देश की वित्तीय आने वाले समय में और बिगड़ सकती है।
नई दिल्ली:

एस एण्ड पी के बाद वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच ने भी भारत की वित्तीय साख पर लाल घेरा लगा दिया है। फिच ने भ्रष्टाचार, अपर्याप्त सुधार, ऊंची मुद्रास्फीति और वृद्धि दर में गिरावट का हवाला देते हुए कहा है कि देश की वित्तीय आने वाले समय में और बिगड़ सकती है।

फिच ने एनटीपीसी, सेल, इंडियन आयल, आरईसी, पीएफसी और एनएचपीसी समेत सार्वजनिक क्षेत्र की 7 कंपनियों के साख परिदृश्य की रेटिंग भी घटाई है।

इस बीच, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि फिच की कार्रवाई पुराने आंकड़ों पर आधारित है। उसने अर्थव्यवस्था में हाल ही में आए सकारात्मक रुख को नजरअंदाज किया है।

इस तरह की साख से वैश्विक बाजार में भारत के सरकारी गैर सरकारी प्रतिष्ठानों के लिए कर्ज की दर महंगी हो सकती है। भारत की वित्तीय साख के परिदृश्य को ‘स्थिर’ से ‘प्रतिकूल’ वर्ग में डालते हुए फिच ने कहा कि भारत को धीमी वृद्धि दर और ऊंची मुद्रास्फीति के विचित्र संयोग का सामना करना पड़ रहा है। देश को निवेश वातावरण के आसपास भ्रष्टाचार और अपर्याप्त आर्थिक सुधार के रूप में ढांचागत चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है।

इससे पहले, अप्रैल में स्टैंडर्ड एंड पूअर्स (एसएंडपी) भी भारत की साख का परिदृष्य स्थायी से घटाकर नकारात्मक कर चुकी है। उसने 11 जून को चेतावनी भी दी कि भारत की क्रेडिट रेटिंग निवेश ग्रेड से नीचे ‘सट्टेबाजी’ की श्रेणी में रखी जा सकता है और भारत निवेश स्तर की साख गंवाने वाला पहला ‘ब्रिक देश’ (ब्राजील, रुस, भारत, चीन) में पहला देश बन सकता है।

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फिच ने कहा, ‘परिदृश्य में संशोधन इस बात का संकेत देता है कि अगर आगे ढांचागत सुधार के कदम नहीं उठाए जाते हैं तो भारत की मध्यम से दीर्घकालीन वृद्धि दर की संभावना और खराब होगी।’