खास बातें
- विकसित देशों में सुधार के कमजोर रुख के बावजूद वैश्विक स्तर पर जिंसों में तेजी बरकरार है और परिणामस्वरूप देश में मुद्रास्फीति का दबाव बना हुआ है।
नई दिल्ली: विकसित देशों में सुधार के कमजोर रुख के बावजूद वैश्विक स्तर पर जिंसों में तेजी बरकरार है और इसके परिणामस्वरूप देश में मुद्रास्फीति का दबाव बना हुआ है। यह जानकारी संसद को दी गई। वित्त राज्यमंत्री नमो नारायण मीणा ने राज्यसभा को एक लिखित उत्तर में बताया, 'विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कमजोर सुधार के बावजूद वैश्विक स्तर पर जिंस कीमतों में उतनी नरमी नहीं आई है जितनी उम्मीद की जा रही थी। इसके परिणामस्वरूप घरेलू मुद्रास्फीति पर आपूर्ति पक्ष का दबाव कायम है।' उन्होंने कहा कि सरकार वैश्विक आर्थिक स्थिति पर निगाह रखे है और देख रही है कि इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर हो सकता है। मीणा का यह उत्तर ऐसे समय आया है जब सरकार मूल्यवृद्धि का सामना कर रही है। मुद्रास्फीति की दर दिसंबर 2010 से नौ प्रतिशत से अधिक बनी हुई है और इस वर्ष जुलाई में यह 9.22 प्रतिशत रही। थोड़े समय की नरमी के बाद खाद्य मुद्रास्फीति दहाई अंक से ऊपर निकल गई। 20 अगस्त को समाप्त सप्ताह में यह 10.05 प्रतिशत हो गई। मुद्रास्फीति को कम करने के लिए मौद्रिक सख्ती की नीति के तहत मार्च 2010 के बाद से भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में 11 बार वृद्धि की है। भारतीय उद्योगों का कहना है कि अधिक ब्याज दरों के कारण उधारी की लागत बढ़ी है और इस प्रकार ताजा निवेश बाधित हो रहा है जिसके कारण औद्योगिक गतिविधियां मंद हुई हैं।