खास बातें
- 1995 में घर खरीदने वालों को मकान लेने के लिए अपनी सालाना आय का 22 गुना धन लगाना पड़ता था, जो अब लोगों की आय बढने से 2011-12 में 4.6 गुना रह गया।
नई दिल्ली: इस समय लोगों को भले ही लग रहा हो कि मकान की कीमतें आसमान छू रही हैं, अपने मकान का सपना उनकी पहुंच से बाहर हो गया है, पर देश की प्रमुख आवास ऋण कंपनी एचडीएफसी लिमिटेड द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि इस समय मकान की कीमतें पिछले तीन दशकों के सबसे मुनासिब स्तर पर हैं।
एचडीएफसी के आंकड़ों के मुताबिक, 2009 की मंदी को छोड़ दें, तो वास्तव में मकान के दाम 10 साल से भी अधिक समय से बढ़ते रहे हैं, लेकिन लगभग दो दशक में क्रयशक्ति के हिसाब से मकान खरीदना अपेक्षाकृत सुगम हुआ है।
एचडीएफसी के अनुसार मकानों का वहनीयता-अनुपात यानी मकानों की औसत कीमत और ग्राहकों की सालाना आय के बीच अनुपात 1995 से मार्च 2012 के बीच 22 से घट कर 4.6 पर आ गया। इसका अर्थ है कि 1995 में घर खरीदने वालों को मकान लेने के लिए अपनी सालाना आय का 22 गुना धन लगाना पड़ता था, जो अब लोगों की आय बढने से 2011-12 में 4.6 गुना रह गया।
एचडीएफसी की प्रबंध निदेशक रेणू सूद कर्नाड ने कहा, कीमतें बढ़ने के बावजूद मकान इस समय इसलिए अधिक वहनीय हुआ है, क्योंकि इस दौरान लोगों की आय का स्तर और अधिक तेजी से बढ़ा है। उन्होंने कहा कि उनके संगठन से लिए जाने वाले आवास ऋण औसतन 19.5 लाख रुपये के हैं और संगठन मकान के मूल्य के 65 प्रतिशत तक वित्तपोषण कर देता है। इस तरह इसके पैसे से खरीदे गए मकानों की औसत कीमत 30 लाख रुपये के आसपास की है।