यह ख़बर 27 फ़रवरी, 2013 को प्रकाशित हुई थी

सरकार ने कहा, गरीबी घटी लेकिन पैमाने का पता नहीं

खास बातें

  • बजट पूर्व आर्थिक समीक्षा में कहा गया कि देश में सरकार ने कहा कि गरीबी में कमी आई है लेकिन गरीबी को आंकने के पैमाने की जांच पड़ताल की जा रही है।
नई दिल्ली:

बजट पूर्व आर्थिक समीक्षा में कहा गया कि देश में सरकार ने कहा कि गरीबी में कमी आई है लेकिन गरीबी को आंकने के पैमाने की जांच पड़ताल की जा रही है।

समीक्षा में कहा गया कि 2004-05 से 2009-10 के दौरान गरीबी सालाना औसतन 1.5 फीसद कम हुई है। हालांकि गरीबी आंकने के पैमाने की जांच हो रही है।

समीक्षा के मुताबिक तेंदुलकर समिति द्वारा सुझाए गए तरीकों के आधार पर 2009-10 में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली आबादी का अनुपात घटकर 29.8 फीसद रह गया। 2004-05 में 37.2 फीसद आबादी गरीबी में जी रही थी।

संख्या के लिहाज से इस अवधि में गरीबों की आबादी 5.24 करोड़ घटी जिनमें ग्रामीण इलकों में रहने वाले लोगों की संख्या 4.81 करोड़ और शहरी गरीबों की तादाद 43 लाख रही।

समीक्षा के मुताबिक 2004-05 से 2009-10 के दौरान गरीबी 1993-94 से 2004-05 के मुकाबले दोगुनी दर से घटी।

उल्लेखनीय है कि योजना आयोग राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के व्यापक सर्वेक्षण के आधार पर गरीबी का आकलन करता है। मासिक प्रति व्यक्ति खपत व्यय (एमपीसीई) के आधार पर गरीबी रेखा को परिभाषित किया जाता है।

समीक्षा में कहा गया कि सुरेश डी तेंदुलकर के नेतृत्व में विशेषज्ञों के समूह की दिसंबर 2009 की रपट में 2004-05 के लिए गरीबी रेखा का स्तर 447 रुपये (ग्रामीण क्षेत्र) एमपीसीई और 579 रुपये (शहरी क्षेत्र) एमपीसीई रखा गया था।

इसी के आधार पर योजना आयोग ने 2009-10 के लिए गरीबी रेखा का स्तर 673 रुपये (ग्रामीण क्षेत्र) एमपीसीई और 860 रुपये (शहरी क्षेत्र) एमपीसीई तय किया।

Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com

हालांकि गरीबी आकलन के पैमाने की विसंगतियों पर उठे विवाद के कारण योजना आयोग ने प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष सी रंगराजन की अध्यक्षता में जून 2012 में गरीब आकलन के तरीके की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों से समूह बनाया है।