Essar Energy अगले पांच साल में भारत और ब्रिटेन में करेगी 3.6 अरब डॉलर का निवेश

एस्सार ग्रुप ग्रीन हाइड्रोजन और अमोनिया प्रोडक्शन से संबंधित परियोजनाओं के लिए एस्सार एनर्जी ट्रांजिशन का गठन करेगी.

Essar Energy अगले पांच साल में भारत और ब्रिटेन में करेगी 3.6 अरब डॉलर का निवेश

Essar Group द्वारा भारत में 1.2 अरब डॉलर का निवेश किया जाएगा.

नई दिल्ली:

एस्सार ग्रुप (Essar Group) ने ब्रिटेन और भारत में कम कॉर्बन उत्सर्जन की ऊर्जा बदलाव परियोजनाओं में अगले पांच साल के दौरान 3.6 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है. इनमें ग्रीन हाइड्रोजन और अमोनिया प्रोडक्शन से संबंधित परियोजनाएं भी हैं. एस्सार ग्रुप ने एनर्जी, मेटल और माइनिंग, इंफ्रास्टक्चर और टेक्नोलॉजी सेक्टर में निवेश किया हुआ है. समूह ने ब्रिटेन में उत्तर-पश्चिम इंग्लैंड में एक प्रमुख एनर्जी ट्रांजिशन सेंटर (Energy Transition Center) के निर्माण के लिए एस्सार एनर्जी ट्रांजिशन (Essar Energy Transition) के गठन की घोषणा की है.

कंपनी ने सोमवार को बयान में कहा, ‘‘एस्सार एनर्जी ट्रांजिशन (ETT) की योजना अगले पांच साल में लो कार्बन एनर्जी ट्रांजिशन प्रोजेक्ट रेंज के डेलवपमेंट में कुल 3.6 अरब डॉलर का निवेश करने की है. इनमें से 2.4 अरब डॉलर का निवेश स्टैनलो में अपनी सुविधा पर लिवरपूल और मैनचेस्टर के बीच और 1.2 अरब डॉलर का निवेश भारत में किया जाएगा. इन परियोजनाओं में ब्रिटेन में वर्टेक्स हाइड्रोजन की एक गीगावॉट की ब्लू हाइड्रोजन परियोजना, ब्रिटेन और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर केंद्रित एक गीगावॉट की हरित अमोनिया सुविधा और 10 लाख टन कम कॉर्बन के जैवईंधन का विकास शामिल है.

वर्टेक्स ब्रिटेन में एस्सार की स्टैनलो रिफाइनरी परिसर में एक हाइड्रोजन मैन्युफाक्चरिंग युनिट बना रही है. इस ज्वॉइंट वेंचर में एस्सार ऑयल ब्रिटेन की 90 प्रतिशत हिस्सेदारी है. यह वेंचर 2026 से दो युनिट से प्रतिवर्ष एक गीगावॉट हाइड्रोजन का उत्पादन करेगा. ब्रिटेन की प्रोग्रेसिव एनर्जी की वर्टेक्स में शेष 10 प्रतिशत हिस्सेदारी है.

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एस्सार कैपिटल (Essar Capital) के निदेशक प्रशांत रुइया ने कहा, ‘‘ईईटी को पेश करना एस्सार की ब्रिटेन को लो कार्बन एनर्जी में आगे लाने की दीर्घावधि की प्रतिबद्धता का हिस्सा है. हम ब्रिटेन में लो कार्बन वाले भविष्य के ईंधन के उत्पादन के जरिये एनर्जी ट्रांजिशन को आगे बढ़ाने को लेकर उत्साहित है. इससे उत्तर-पश्चिम इंग्लैंड में औद्योगिक कॉर्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कमी आएगी.