आम बजट-2016 की कवायद शुरू, सरकार पर सूखे के हालात से निपटने का दबाव

आम बजट-2016 की कवायद शुरू, सरकार पर सूखे के हालात से निपटने का दबाव

वित्त मंत्री अरुण जेटली (फाइल फोटो)।

नई दिल्ली:

आम बजट 2016 की कवायद शुरू हो गई है। वित्त मंत्री पर यह दबाव है कि कई राज्यों में पड़ रहा सूखा देखते हुए वे किसानों-मजदूरों का खास खयाल रखें। मंगलवार को सामाजिक क्षेत्र के नुमाइंदों ने उनसे मुलाकात की और कहा कि मनरेगा का बजट कम से कम 5000 करोड़ और बढ़ना चाहिए जिससे सूखा-ग्रस्त इलाकों में प्रभावित लोगों को रोजगार के ज्यादा अवसर मुहैया कराए जा सकें।

औद्योगिक उत्पादन गिरा
दरअसल जब वित्त मंत्री अरुण जेटली सामाजिक क्षेत्र के नुमाइंदों से बजट पर राय ले रहे थे, उसके कुछ ही घंटे बाद औद्योगिक उत्पादन के गिरे हुए आंकड़े सामने आ गए। औद्योगिक उत्पादन दर 9.8% के मुकाबले गिरकर 3.2% रह गई। यानी चुनौती दोहरी है, आर्थिक मोर्चे पर भी, सामाजिक मोर्चे पर भी।

मनरेगा के लिए 5000 करोड़ की मांग
वित्त मंत्री के साथ हुई इस बैठक में मनरेगा में 5000 करोड़ रुपये बढ़ाने की मांग की गई। 2015-16 में इस पर वित्त मंत्री ने 34,699 करोड़ का बजट दिया था। बीड़ी-सिगरेट पर एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ाने का सुझाव दिया गया और यह शिकायत भी की गई कि दलितों-आदिवासियों के बजट का पूरा इस्तेमाल नहीं होता। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह भी मांग की कि बजटीय प्रक्रियाओं को और पारदर्शी बनाना बेहद ज़रूरी है।

शिक्षा के बजट की व्यवस्था को लेकर असंतोष
शिक्षा और सेहत के बजट को भी बढ़ाने की मांग इस बैठक में उठी। राइट टू एजुकेशन के कन्वीनर अंबरीश राय ने बैठक के बाद कहा, "एनडीए सरकार के पिछले बजट में शिक्षा के लिए 6000 करोड़ की कटौती की गई थी। इस बार वित्त मंत्री ने कहा कि खर्च कितना किया जाए इसका अधिकार राज्यों पर छोड़ दिया गया है। यह उचित फैसला नहीं है।"

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सूखे से राहत के लिए राज्यों ने मांगे 22000 करोड़
इसके अलावा 9 राज्यों के 207 जिलों में सूखे का सवाल भी वित्त मंत्री के बजट के सामने होगा। राज्यों ने केंद्र से अब तक 22,000 करोड़ से ज़्यादा राहत मांगी है। इस बार बजट ऐसे वक्त पर तैयार किया जा रहा है जब देश के कई राज्यों में सूखा पड़ा है और लाखों किसान बेसब्री से सरकार से राहत मिलने का इंतजार कर रहे हैं। अब देखना होगा कि सामाजिक क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने वित्त मंत्री के सामने जो मांगें रखी हैं उन पर वे कितनी गंभीरता से विचार करते हैं।