यह ख़बर 20 अगस्त, 2013 को प्रकाशित हुई थी

बार्कलेज को दिखा 1991 जैसा संकट, बैंकों की ऋण वृद्धि धीमी पड़ने की आशंका

खास बातें

  • विदेशी ब्रोकरेज कंपनी बार्कलेज ने मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को 1991-92 के संकट जैसा बताते हुए कहा कि बैंकों की ऋण वृद्धि घटकर 10 से 11 प्रतिशत पर आ सकती है। कुछ ऐसा ही 90 के दशक की शुरुआत में भी हुआ था।
मुंबई:

विदेशी ब्रोकरेज कंपनी बार्कलेज ने मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को 1991-92 के संकट जैसा बताते हुए कहा कि बैंकों की ऋण वृद्धि घटकर 10 से 11 प्रतिशत पर आ सकती है। कुछ ऐसा ही 90 के दशक की शुरुआत में भी हुआ था।

बार्कलेज के नोट में कहा गया है, ‘मौजूदा वृहद स्थिति तथा उसी के साथ मौद्रिक नीति की चुनौतियां बहुत हद तक 1991-92 की तरह ही हैं।’

बार्कलेज ने मौजूदा स्थिति की तुलना 1991-92 से करते हुए कई कारक गिनाए हैं। मसलन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की धीमी वृद्धि दर, दबाव वाला विदेशी खाता तथा मुद्रास्फीति।

वित्त वर्ष 2012-13 में आर्थिक वृद्धि दर घटकर दशकभर के निचले स्तर 5 फीसद पर आ गई। वहीं चालू खाते का घाटा जीडीपी के 4.8 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर पर रहा है। रुपये में गिरावट के बीच मुद्रास्फीति बढ़कर 5.79 प्रतिशत पर पहुंच गई है।

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित अनेक शीर्ष आर्थिक नीति निर्माता हालांकि, यह कह रहे हैं कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियां 1991 के समान नहीं है। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने भी कहा है कि मौजूदा आर्थिक परिदृश्य की 1991 से कोई तुलना नहीं है।