मशहूर गायिका आशा भोसले अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज में बसे गीत और उनसे जुड़े किस्से संगीत प्रेमियों के लिए हमेशा जिंदा रहेंगे. ऐसे ही एक खास किस्से का रिश्ता जुड़ा है मुजफ्फर अली की क्लासिक फिल्म ‘उमराव जान' से, जिसे उन्होंने निर्मित भी किया और निर्देशित भी. फिल्म ‘उमराव जान' न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट साबित हुई, बल्कि इसका संगीत भी आज तक लोगों की जुबान पर है. खास बात यह रही कि इस फिल्म में आशा भोसले ने गजलें गाईं और उनकी आवाज ने इन गजलों को अमर बना दिया. इसी फिल्म के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था.
हालांकि, बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि शुरुआत में इस फिल्म के संगीतकार जयदेव थे और योजना यह थी कि आशा भोसले फिल्म में सिर्फ एक ही गाना गाएंगी. लेकिन बाद में यह फैसला बदला और फिल्म का संगीत देने की जिम्मेदारी मशहूर संगीतकार खय्याम को सौंपी गई.
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जब खय्याम ने फिल्म का संगीत संभाला तो उन्होंने ‘उमराव जान' के गीतों को नई दिशा दी. इसी दौरान निर्माता-निर्देशक मुजफ्फर अली ने ‘उमराव जान' की कहानी पर आधारित एक किताब आशा भोसले को पढ़ने के लिए दी. बताया जाता है कि आशा जी ने वह किताब पूरी पढ़ी और उसके बाद किरदार ‘उमराव' उनके भीतर इस तरह उतर गया कि उनकी गायकी में भी उसका असर साफ झलकने लगा.
यही वजह रही कि फिल्म की गजलों में शास्त्रीय संगीत की गहराई और ठहराव नजर आया और आशा भोसले की आवाज इन गीतों पर पूरी तरह से फिट बैठ गई. नतीजा यह हुआ कि जिस फिल्म में वे सिर्फ एक गीत गाने वाली थीं, उसी फिल्म के उन्होंने लगभग सभी यादगार गीत गाए और फिर इतिहास बन गया. ‘उमराव जान' आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे खूबसूरत संगीत अध्यायों में गिनी जाती है और आशा भोसले की आवाज में गाई गईं गजलें उनकी विरासत का सबसे चमकदार हिस्सा बनकर हमेशा जिंदा रहेंगी.
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