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Vande Mataram:  150 साल पुराना वंदे मातरम् कैसे बना आजादी की आवाज, जिसने उड़ा दी थी अंग्रेजों की नींद, 4 फिल्मों में हुआ इस्तेमाल,  क्या है पूरी कहानी?

स्वतंत्रता दिवस समारोह के मौके पर पहली बार लाल किले पर राष्‍ट्रगीत 'वंदे मातरम' गाया गया.  कार्यक्रम की थीम रखी गई, 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने में युवाओं की शक्ति का योगदान. आज हम बता रहे हैं राष्‍ट्रगीत 'वंदे मातरम' के इतिहास के बारे में...

Vande Mataram:  150 साल पुराना वंदे मातरम् कैसे बना आजादी की आवाज, जिसने उड़ा दी थी अंग्रेजों की नींद, 4 फिल्मों में हुआ इस्तेमाल,  क्या है पूरी कहानी?
 150 साल पुराना वंदे मातरम् कैसे बना आजादी की आवाज
नई दिल्ली:

स्वतंत्रता दिवस समारोह के मौके पर पहली बार लाल किले पर राष्‍ट्रगीत 'वंदे मातरम' गाया गया.  कार्यक्रम की थीम रखी गई, 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने में युवाओं की शक्ति का योगदान. आज हम बता रहे हैं राष्‍ट्रगीत 'वंदे मातरम' के इतिहास के बारे में... राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम, जिसका आशय है “मां, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं”. यह राष्‍ट्रगीत स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्र निर्माताओं की अनगिनत पीढ़ियों को प्रेरित करती रही है और यह भारत की राष्ट्रीय पहचान और सामूहिक भावना का प्रतीक है.

कविता से राष्ट्रीय गीत बनने तक का सफर

'वंदे मातरम' पहली बार साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में 7 नवंबर 1875 को प्रकाशित हुई थी. बाद में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे अपने अमर उपन्यास 'आनंदमठ' में लिया, जो 1882 में प्रकाशित हुई थी. इस गीत को रवींद्रनाथ टैगोर ने संगीतबद्ध किया था. यह देश की सभ्यता, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग बन चुका है. वंदे मातरम के महत्‍व को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक मूल को जानना बहुत जरूरी है. 

यह गीत पहली बार 1875 में प्रकाशित हुआ था.  इस तथ्‍य की पुष्टि श्री अरबिंदो द्वारा 16 अप्रैल, 1907 को अंग्रेजी दैनिक 'बंदे मातरम' में लिखे एक लेख से होती है, जिसमें इस बात का उल्‍लेख है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने मशहूर गीत की रचना बत्तीस साल पहले की थी.  उस समय बहुत कम लोगों ने इसे सुना था.

पुस्‍तक के रूप में प्रकाशित होने से पहले आनंद मठ बंगाली मासिक पत्रिका 'बंगदर्शन' में धारावाहिक के रूप में छपा था, जिसके संस्थापक संपादक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय थे."वंदे मातरम" गीत मार्च-अप्रैल 1881 के अंक में उपन्‍यास  के धारावाहिक प्रकाशन की पहली किस्त में छपा था. 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने पहली बार भारत के बाहर स्टटगार्ट, बर्लिन में तिरंगा झंडा फहराया था. उस झंडे पर वंदे मातरम लिखा हुआ था.

आनंद मठ और देशभक्ति का धर्म

उपन्‍यास 'आनंद मठ' का मूल कथानक संन्यासियों के एक समूह के इर्द-गिर्द घूमता है, जिन्हें संतान कहा जाता है,  जो अपनी मातृभूमि के लिए अपनी जिंदगी समर्पित कर देते हैं. वे मातृभूमि को देवी मां के रूप में पूजते हैं. उनकी भक्ति सिर्फ अपनी जन्मभूमि के लिए है. "वंदे मातरम" आनंद मठ के संतानों द्वारा गाया गया गीत है. यह "राष्‍ट्रभक्ति के धर्म" का प्रतीक था, जो आनंद मठ का मुख्य विषय था.

अपने मंदिर में उन्होंने मातृभूमि को दर्शाने वाली मां की तीन मूर्तियां रखीं. मां जो अपनी भव्‍य महिमा में महान और गौरवशाली मां जो अभी दुखी और धूल में पड़ी है. मां जो भविष्य में अपनी पुरानी महिमा में पुन: प्रतिष्ठित होगी. श्री अरबिंदो के शब्दों में "उनकी कल्पना की मां के 14 करोड़ हाथों में भिक्षा पात्र नहीं, बल्कि तेज धार वाली तलवारें थीं"

कौन थे बंकिम चंद्र चटर्जी 

वंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी (1838–1894) 19वीं सदी के बंगाल के मशहूर लेखक, विचारक और देशभक्त थे. 19वीं सदी के दौरान बंगाल के बौद्धिक और साहित्यिक इतिहास में उनकी बहुत महत्‍वूपर्ण भूमिका  है.  उनकी रचना वंदे मातरम की राष्ट्रवादी चिंतन में मील का पत्‍थर माना जाता है, जो मातृभूमि के प्रति भक्ति और आध्यात्मिक आदर्शवाद के मेल का प्रतीक है. बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी लेखनी के जरिए, न केवल बंगाली साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि भारत के शुरुआती राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए बुनियादी वैचारिक सिद्धांत भी रखे. वंदे मातरम में उन्होंने देश को मातृभूमि को मां के रूप में देखने का नजरिया दिया.

'वंदे मातरम संप्रदाय' की स्थापना

अक्टूबर 1905 में उत्‍तरी कलकत्ता में मातृभूमि को एक मिशन और धार्मिक जुनून के तौर पर बढ़ावा देने के लिए एक 'वंदे मातरम संप्रदाय'की स्थापना की गई थी. इस संप्रदाय के सदस्य हर रविवार को"वंदे मातरम" गाते हुए प्रभात फेरियां निकालते थे और मातृभूमि के समर्थन में लोगों से स्‍वैच्छिक दान भी लेते थे. इस संप्रदाय की प्रभात फेरियों  में कभी-कभी रवींद्रनाथ टैगोर भी शामिल होते थे. 20 मई 1906 को, बारीसाल (जो अब बांग्लादेश में है) में एक अभूतपूर्व वंदे मातरम जुलूस निकाला गया,जिसमें दस हजार से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. हिंदू और मुसलमान दोनों ही शहर की मुख्य सड़कों पर वंदे मातरम के झंडे लेकर मार्च कर रहे थे.

अगस्त 1906 में, बिपिन चंद्र पाल के संपादन में 'बंदे मातरम' नाम का एक अंग्रेजी दैनिक  शुरू हुआ, जिसमें बाद में श्री अरबिंदो संयुक्‍त संपादक बने. अपने तेज और प्रभावशाली संपादकीय लेखों  के जरिए यह अखबार भारत को जगाने का एक सशक्‍त माध्‍यम बन गया, जिसने स्वावलंबन, एकता और राजनीतिक चेतना का संदेश पूरे भारत के लोगों तक फैलाया. निडरता से राष्ट्रवाद का प्रचार करते हुए युवा भारतीयों को औपनिवेशिक गुलामी से बाहर निकलने के लिए प्रेरित करते हुए 'बंदे मातरम' दैनिक  राष्ट्रवादी चिंतन को जाहिर करने और लोगों की राय जुटाने का एक बड़ा मंच बन गया.

गाने और नारे दोनों के तौर पर वंदे मातरम के बढ़ते प्रभाव से घबराकर ब्रिटिश सरकार ने इसके प्रसार को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए. नए बने पूर्वी बंगाल प्रांत की सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों में वंदे मातरम गाने या बोलने पर रोक लगाने वाले परिपत्र जारी किए. शैक्षणिक संस्‍थानों को मान्यता रद्द करने की चेतावनी दी गई और राजनीतिक आंदोलन में हिस्सा लेने वाले छात्रों को सरकारी नौकरी से निकालने की धमकी दी गई.

“वंदे मातरम” गीत भारत के स्‍वाधीनता संग्राम का प्रतीक बन गया

 यह गीत शुरू में स्वदेशी और विभाजन विरोधी आंदोलनों के दौरान लोकप्रिय हुआ और जल्द ही क्षेत्रीय सीमाओं को पार करके राष्ट्रीय जागरण का गान बन गया. बंगाल की सड़कों से लेकर बॉम्बे के दिल और पंजाब के मैदानों तक, "वंदे मातरम" की गूंज औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में सुनाई देने लगी. इसे गाने पर रोक लगाने की ब्रिटिश कोशिशों ने इसके देशभक्ति से जुड़े महत्व को और बढ़ा दिया, और इसे एक ऐसी नैतिक शक्ति में बदल दिया जिसने जाति, धर्म और भाषा की परवाह किए बिना लोगों को एकजुट किया. नेताओं, छात्रों और क्रांतिकारियों ने इसके छंदों से प्रेरणा ली और इसे राजनीतिक सभाओं, प्रदर्शनों और जेल जाने से पहले गाया जाने लगा.  

राजनीतिक  नारे के तौर पर वंदे मातरम का सबसे पहले इस्तेमाल

राजनीतिक  नारे के तौर पर वंदे मातरम का सबसे पहले इस्तेमाल 7 अगस्त 1905 को हुआ था, जब सभी समुदायों के हजारों छात्रों ने कलकत्ता (कोलकाता) में टाउन हॉल की तरफ जुलूस निकालते हुए वंदे मातरम और दूसरे नारों से आसमान गूंजा दिया था. वहां एक बड़ी ऐतिहासिक सभा में विदेशी सामानों के बहिष्‍कार  और स्वदेशी अपनाने के  प्रसिद्ध  प्रस्ताव को पास किया गया, जिसने बंगाल के बंटवारे के खिलाफ आंदोलन का संकेत दिया.  इसके बाद बंगाल में जो घटनाएं हुईं, उन्होंने पूरे देश में जोश भर दिया.

 
इन फिल्मों में हुआ वंदे मातरम का इस्तेमाल

वंदे मातरम (2010): तमिल और मलयालम में बनी एक एक्शन थ्रिलर फिल्म, जिसमें ममूटी और अर्जुन सर्जा ने दो ऐसे अफसरों की भूमिका निभाई है जो आतंकवादी साजिशों का पर्दाफाश करते हैं.
वंदे मातरम (2001): विजयशांति और अंबरीश अभिनीत एक राजनीतिक एक्शन फिल्म, भ्रष्टाचार और बाहरी खतरों से लड़ने पर केंद्रित थी.
वंदे मातरम (1985): टी. कृष्णा द्वारा निर्देशित यह एक तेलुगु सामाजिक-राजनीतिक नाटक है, जिसमें राजशेखर और विजयशांति ने काम किया है.
फाइटर (2024): ऋतिक रोशन की फिल्म में लोकप्रिय आधुनिक देशभक्ति गीत "वंदे मातरम (द फाइटर एंथम)" है. 
स्वातंत्र्य वीर सावरकर (2024): इसमें ऐतिहासिक वंदे मातरम गीत का एक दमदार और थीम पर आधारित वर्शन शामिल है.
 

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