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Vadh Review: मजबूर मां-बाप ने किया कर्ज देने वाले का कत्ल, आटे की चक्की में पीसी हड्डियां, सांसें रोक देंगे 1 घंटे 50 मिनट

Vadh Review: नीना गुप्ता और संजय मिश्रा का वध 2 छह फरवरी को रिलीज हो रही है. लेकिन उससे पहले एक बार नजर डाल लीजिए कि 2022 में आई वध कैसी थी, पढ़ें मूवी रिव्यू

Vadh Review: मजबूर मां-बाप ने किया कर्ज देने वाले का कत्ल, आटे की चक्की में पीसी हड्डियां, सांसें रोक देंगे 1 घंटे 50 मिनट
Vadh Review: जानें कैसी है नीना गुप्ता और संजय मिश्रा की वध, पढ़ें रिव्यू

Vadh Review: वध 2 सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है. फिल्म में संजय मिश्रा और नीना गुप्ता की जो़ड़ी फिर से लौट रही है. अब पार्ट दो आ रहा है तो एक बार वध (2022) पर नजर डालते हैं, इस पुरानी यादें भी ताजा हो जाएंगी और कहानी को लेकर दोहराव भी. वध ओटीटी प्लेटफॉर्म प्राइम वीडियो पर मौजूद है. ये ऐसी है फिल्म जो दिल को छू लेती है, दिमाग को हिला देती है और आखिर में सोचने पर मजबूर कर देती है. ये फिल्म देखकर लगता है जैसे कोई आम आदमी की जिंदगी को कैमरे में कैद कर लिया हो. संजय मिश्रा और नीना गुप्ता की जोड़ी ने ऐसा कमाल किया है कि आंखें नम हो जाती हैं. 

कहानी बिल्कुल सच्ची लगती है. ग्वालियर के एक छोटे से मोहल्ले में रहते हैं शंभूनाथ मिश्रा (संजय मिश्रा), रिटायर्ड टीचर, और उनकी पत्नी मंजू (नीना गुप्ता). बेटा गुड्डू अमेरिका चला गया, पढ़ाई के लिए घर गिरवी रखकर लोन लिया था. लेकिन बेटा? वो तो महीने-महीने पैसे नहीं भेजता. अब लोन शार्क प्रजापति पांडेय (सौरभ सचदेवा) हर महीने आता है, धमकाता है, घर छीनने की बात करता है. पुलिस? वो भी उसी के साथ मिली हुई. इंस्पेक्टर शक्ति सिंह (मनाव विज) का रोल भी कमाल का है, थोड़ा भ्रष्ट, थोड़ा मजबूर.

फिल्म की पहली हाफ में जो स्लो बर्न है, वो दर्द देता है. देखते-देखते गुस्सा आता है. आम आदमी की मजबूरी, बेटे की लापरवाही, समाज की बेरुखी, सब कुछ दिखाया गया है वो भी बिना ओवरड्रामा के. संजय मिश्रा का चेहरा देखो तो उनमें आंखों में छिपा दर्द, और जुबान पर न आने वाली बातें. नीना गुप्ता तो चुपचाप सब सहती हैं, लेकिन जब बोलती हैं तो दिल पर लगता है. दोनों की केमिस्ट्री इतनी रियल है कि लगता है ये हमारे पड़ोस में रहते हैं.

दूसरा हाफ, कमाल है. एक घटना होती है और सब बदल जाता है. वो जो शांत टीचर था, वो अब कुछ और बन जाता है. यहां से थ्रिलर मोड ऑन हो जाता है. पुलिस जांच, छिपाने की कोशिशें, टेंशन, सब कुछ इतना टाइट है कि सांस रुक जाती है. कई जगह लगता है ये दृश्यम जैसा है, लेकिन वध अपनी अलग पहचान रखती है. यहां मसला सिर्फ क्राइम कवर-अप नहीं, बल्कि नैतिकता का भी है, हत्या और वध में फर्क क्या है? क्या मजबूरी इंसान को गुनाहगार बनाती है?

जसपाल सिंह संधू और राजीव बर्नवाल का डायरेक्शन अच्छा है, लेकिन असली जान तो एक्टिंग में है. संजय मिश्रा ने जानदार परफॉर्मेंस दी है, कभी हंसाते हैं, कभी रुलाते हैं, कभी डराते हैं. नीना गुप्ता क्वाइटली ब्रिलियंट हैं. सौरभ सचदेवा का खलनायक रोल डरावना है, और मनाव विज पुलिस वाले का रोल ग्रे शेड्स के साथ परफेक्ट. 

कमियां? हां, थोड़ी. मिडिल में कुछ जगह ड्रैग लगता है, और क्लाइमेक्स थोड़ा सिंपल. जो लोग रियलिस्टिक सिनेमा पसंद करते हैं, थ्रिलर चाहते हैं, और अच्छी एक्टिंग देखना चाहते हैं, उनके लिए वध मस्ट वॉच है.
 

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