बॉलीवुड में कई सितारों की किस्मत एक गाने ने बदल दी, लेकिन एक ऐसी भी कलाकार थीं जिन्होंने मौका न मिलने पर संगीतकार को समुद्र में कूदकर जान देने तक की धमकी दे डाली. यह कलाकार थीं उमा देवी, जिन्हें दुनिया बाद में टुनटुन के नाम से जानने लगी. 1947 में फिल्म दर्द का गाना ‘अफसाना लिख रही हूं दिल-ए-बेकरार का' इतना बड़ा सुपरहिट साबित हुआ कि उमा देवी रातोंरात लोकप्रिय प्लेबैक सिंगर बन गईं. हालांकि वक्त के साथ उनकी गायकी का दौर कम हुआ, लेकिन उन्होंने कॉमेडी की दुनिया में ऐसा मुकाम बनाया कि हिंदी सिनेमा की पहली महिला कॉमेडियन के रूप में हमेशा के लिए अमर हो गईं.
समुद्र में कूदने की धमकी के बाद मिला पहला मौका
उमा देवी 23 साल की उम्र में घर छोड़कर मुंबई पहुंची थीं. उन्होंने सीधे मशहूर संगीतकार नौशाद के घर जाकर कहा कि वह गा सकती हैं और अगर मौका नहीं मिला तो समुद्र में कूद जाएंगी. नौशाद ने उनका ऑडिशन लिया और तुरंत काम दे दिया. 1946 में उन्होंने पहली बार प्लेबैक सिंगर के तौर पर गाया, लेकिन असली पहचान 1947 में फिल्म दर्द के गीत ‘अफसाना लिख रही हूं दिल-ए-बेकरार का' से मिली. यह गाना उस दौर के सबसे लोकप्रिय गीतों में शामिल हुआ और उमा देवी की आवाज घर-घर पहुंच गई.
गायकी से कॉमेडी क्वीन बनने तक का सफर
1948 में अनोखी अदा और चंद्रलेखा जैसी फिल्मों के गीतों ने भी उन्हें पहचान दिलाई, लेकिन बाद में बदलते संगीत और नई आवाजों के आने से उनका करियर प्रभावित होने लगा. तब नौशाद ने उन्हें अभिनय करने की सलाह दी. उनकी पहली फिल्म ‘बाबुल' (1950) थी, जिसमें उन्होंने दिलीप कुमार के साथ काम किया. इसी दौरान दिलीप कुमार ने उन्हें नया नाम ‘टुनटुन' दिया. इसके बाद उन्होंने आर-पार, मिस्टर एंड मिसेज 55, प्यासा और नमक हलाल जैसी फिल्मों में अपनी शानदार कॉमिक टाइमिंग से दर्शकों का दिल जीत लिया. करीब पांच दशक लंबे करियर में उन्होंने लगभग 198 फिल्मों में काम किया और हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय महिला कॉमेडियन बन गईं.
शादी, परिवार और निधन
उमा देवी की निजी जिंदगी भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी. उनके सुपरहिट गाने ‘अफसाना लिख रही हूं' के एक प्रशंसक दिल्ली से मुंबई आ पहुंचे. बाद में दोनों ने 1947 में शादी कर ली. उनके पति का नाम अख्तर अब्बास काजी था, जिन्हें वह प्यार से ‘मोहन' कहकर बुलाती थीं. इस दंपति के दो बेटे और दो बेटियां हुईं. 1992 में उनके पति का निधन हो गया. लंबे समय तक बीमारी से जूझने के बाद 23 नवंबर 2003 को मुंबई के अंधेरी में 80 वर्ष की उम्र में टुनटुन ने अंतिम सांस ली. अपने पीछे वह चार बच्चों, चार पोते-पोतियों और भारतीय सिनेमा में कॉमेडी की एक ऐसी विरासत छोड़ गईं, जिसे आज भी याद किया जाता है.
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