विज्ञापन

Success Story: शहंशाह-ए-गजल ने झेला बंटवारे का दर्द, दिन में नौकरी रात में रियाज, लता मंगेशकर भी थीं मेहदी हसन की फैन

शहंशाह-ए-गजल के नाम से मशहूर मेहदी हंसन की संघर्ष भरी सक्सेस स्टोरी के बारे में आप नहीं जानते होंगे, जिन्होंने ना सिर्फ बंटवारे का दर्द, बल्कि मैकेनिक की नौकरी तक की. लेकिन उनके रियाज का जुनून ने किस्मत बदल दी. 

Success Story: शहंशाह-ए-गजल ने झेला बंटवारे का दर्द, दिन में नौकरी रात में रियाज, लता मंगेशकर भी थीं मेहदी हसन की फैन
शहंशाह-ए-गजल कहलाते थे मेहदी हसन, लता मंगेशकर भी आवाज को मानती थीं भगवान
नई दिल्ली:

गजल की दुनिया में शहंशाह-ए-गजल कहलाने वाले मेहदी हसन ने अपनी आवाज से करोड़ों लोगों को दीवाना बनाया. उन्होंने हौसले और मेहनत के दम पर कामयाबी हासिल की. एक वक्त ऐसा था, जब वह परिवार का पेट पालने के लिए साइकिल की दुकान पर काम किया करते थे. इन मुश्किल हालातों में भी उन्होंने संगीत से अपना रिश्ता कभी खत्म नहीं होने दिया और आखिरकार गजल की दुनिया के सबसे बड़े नामों में शामिल हो गए. मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927 को राजस्थान के झुंझुनू जिले में हुआ था. उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहां संगीत पीढ़ियों से मौजूद था. उनके पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान बड़े कलाकार थे.  उन्हें बचपन से ही संगीत का माहौल मिला और महज 8 साल की उम्र में संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दिया था. कम उम्र में ही उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीख ली थीं. 18 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मेहदी हसन ध्रुपद, ठुमरी और खयाल गायकी में काफी निपुण हो चुके थे. 

मेहदी हसन ने झेला बंटवारे का दर्द

जब उनका करियर आगे बढ़ने वाला था, तभी देश के बंटवारे ने उनकी जिंदगी बदल दी. साल 1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन के बाद मेहदी हसन परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए. नई जगह पर शुरुआत करना आसान नहीं था. परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहा था और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया था. ऐसे समय में मेहदी हसन ने परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए साइकिल की दुकान पर मैकेनिक का काम शुरू किया, लेकिन संगीत के प्रति अपना जुनून कभी कम नहीं होने दिया. 

ये भी पढ़ें- दूरदर्शन का 39 साल पुराना वो शो, जिसने 'रामायण' के दौर में भी बटोरी खूब वाहवाही, यहीं से बदली थी सलमान खान की हीरोइन की किस्मत

दिन में काम और रात में रियाज करते थे मेहदी हसन

दिन में वह काम किया करते थे और रात को रियाज करते थे. यही रियाज आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना. करीब दस साल तक संघर्ष करने के बाद साल 1957 में उन्हें रेडियो पाकिस्तान पर गाने का मौका मिला. शुरुआत में उन्होंने ठुमरी गाकर पहचान बनाई, लेकिन जल्द ही उन्होंने गजल गायकी की ओर रुख किया. उनकी शास्त्रीय संगीत की समझ और शब्दों को महसूस करके गाने की शैली ने उन्हें बाकी गायकों से अलग पहचान दी. देखते ही देखते मेहदी हसन गजल की दुनिया का बड़ा नाम बन गए. 

मेहदी हसन की गजलों ने बनाई भारत में पहचान

इसके बाद उन्होंने पाकिस्तानी फिल्मों के लिए भी कई यादगार गीत गाए. उनकी लोकप्रियता सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया में उनके फैंस बन गए. उनकी गाई हुई गजलें 'रंजिश ही सही', 'गुलों में रंग भरे', 'अब के हम बिछड़े तो शायद', 'दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है' और 'मोहब्बत करने वाले कम न होंगे' आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं. 

लता मंगेशकर भी थीं फैन

मेहदी हसन की आवाज के मुरीद भारत के भी कई बड़े कलाकार थे. महान गायिका लता मंगेशकर ने उनकी गायकी की तारीफ करते हुए कहा था कि ऐसा लगता है जैसे मेहदी हसन साहब के गले में भगवान बोलते हैं. जगजीत सिंह समेत कई बड़े गायकों ने उन्हें अपना प्रेरणास्रोत माना. संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले. पाकिस्तान सरकार ने उन्हें प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस, तमगा-ए-इम्तियाज, हिलाल-ए-इम्तियाज और निशान-ए-इम्तियाज जैसे सम्मानों से नवाजा. भारत में उन्हें साल 1979 में केएल सहगल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. नेपाल सरकार ने भी उन्हें गोरखा दक्षिणा बाहु सम्मान दिया. मेहदी हसन का निधन 13 जून 2012 को कराची में हुआ. बीमारी के कारण उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी आवाज आज भी जिंदा है. 

ये भी पढे़ं- मोहम्मद रफी का 69 साल पुराना गाना, बना 'सिरदर्द का इलाज', विज्ञापनों में खूब हुआ इस्तेमाल, आज भी कहलाता है चंपी सॉन्ग

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Mehdi Hassan, Lata Mangeshkar, Bollywood
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com