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नेशनल अवॉर्ड से लेकर ऑस्कर तक पहुंची थी पहली फिल्म, वक्त ने मारी पलटी, ऑटो चलाकर 150 रुपये में कर रहे गुजारा

बचपन में पहली ही फिल्म से नेशनल अवॉर्ड जीता, फिल्म ऑस्कर तक पहुंची और पूरी दुनिया ने अभिनय की तारीफ की. लेकिन किस्मत ने ऐसा मोड़ लिया कि आज यही अभिनेता ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार का गुजारा कर रहा है.

नेशनल अवॉर्ड से लेकर ऑस्कर तक पहुंची थी पहली फिल्म, वक्त ने मारी पलटी, ऑटो चलाकर 150 रुपये में कर रहे गुजारा
नेशनल अवॉर्ड से लेकर ऑस्कर तक पहुंची थी पहली फिल्म, वक्त ने मारी पलटी
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बॉलीवुड में हर चमकती कहानी की हैप्पी एंडिंग हो, ऐसा जरूरी नहीं है. कई सितारे ऐसे भी रहे हैं. जिन्होंने पहली ही फिल्म से इतिहास रच दिया. लेकिन वक्त के साथ उनकी पहचान धुंधली पड़ गई. आज हम आपको एक ऐसे ही एक्टर की कहानी बता रहे हैं. जिसने बचपन में ऐसी फिल्म दी जिसे ऑस्कर तक पहुंचने का गौरव मिला. राष्ट्रपति के हाथों नेशनल अवॉर्ड भी मिला, पूरी दुनिया ने उनकी एक्टिंग की तारीफ की. लेकिन कुछ साल बाद हालात ऐसे बदल गए कि फिल्मों से दूर होकर उन्हें ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार का पेट पालना पड़ा. उनकी जिंदगी की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है.

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सड़कों पर रहने वाला बच्चा बना हीरो

ये कहानी है शफीक सैयद की. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शफीक बचपन में बिना टिकट बेंगलुरु से मुंबई पहुंच गया था. फिल्मों का सपना लेकर आए इस बच्चे के पास रहने के लिए घर तक नहीं था. वो चर्चगेट स्टेशन के आसपास दूसरे बच्चों के साथ सड़कों पर ही रहता था. इसी दौरान मशहूर फिल्ममेकर मीरा नायर की नजर उस पर पड़ी. उन्होंने सड़क पर रहने वाले बच्चों के लिए एक्टिंग वर्कशॉप रखी और वहीं से शफीक की किस्मत बदल गई. मीरा नायर ने उसे अपनी फिल्म 'सलाम बॉम्बे' का लीड हीरो बना दिया. 1988 में रिलीज हुई फिल्म को 1989 के ऑस्कर अवॉर्ड्स में बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म कैटेगरी में नॉमिनेशन मिला. वहीं शफीक की शानदार एक्टिंग के लिए उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. उस समय हर किसी को लग रहा था कि ये बच्चा आगे चलकर बड़ा स्टार बनेगा.

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अब ऑटो चलाकर चल रहा है घर

लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था. 'सलाम बॉम्बे' की जबरदस्त कामयाबी के बाद भी शफीक को फिल्मों में लगातार काम नहीं मिला. कुछ साल बाद वो फिल्म 'पतंग' में नजर आए, लेकिन इसके बाद ऑफर लगभग बंद हो गए. उन्होंने कई प्रोड्यूसर्स और स्टूडियो के चक्कर लगाए, मगर हर जगह से निराशा ही हाथ लगी. आखिरकार शफीक मुंबई छोड़कर बेंगलुरु लौट गए और परिवार चलाने के लिए ऑटो रिक्शा चलाने लगे. एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि एक समय ऐसा भी था जब उनकी रोज की कमाई करीब 150 रुपये होती थी. उन्होंने ये भी खुलासा किया था कि आर्थिक तंगी की वजह से वो इतने टूट गए थे कि दो बार आत्महत्या की कोशिश तक कर चुके हैं. शफीक ने ये दर्द भी साझा किया था कि जब 'सलाम बॉम्बे' दुनिया भर में सम्मान बटोर रही थी और फिल्म की टीम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जा रही थी, तब उन्हें किसी ने याद तक नहीं किया. बाद में वो कन्नड़ फिल्म 'केयर ऑफ फुटपाथ 2' में नजर आए. लेकिन उन्हें फिर कभी वैसी पहचान नहीं मिल सकी.

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