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टाइपराइटर बेचने वाले लड़के ने बदल दिया भारतीय सिनेमा का इतिहास, वो सुपरस्टार जिसे लता और किशोर भी मानते थे गुरु

टाइपराइटर बेचने से लेकर भारतीय सिनेमा की दिशा बदलने तक, एक ऐसे कलाकार की कहानी जिसने अपनी आवाज से पूरे दौर को अमर कर दिया. लता मंगेशकर और किशोर कुमार जैसे दिग्गज भी इन्हें अपना गुरु मानते थे.

टाइपराइटर बेचने वाले लड़के ने बदल दिया भारतीय सिनेमा का इतिहास, वो सुपरस्टार जिसे लता और किशोर भी मानते थे गुरु
केएल सहगल फोटो

कुंदन लाल सहगल को भारतीय सिनेमा का पहला 'सुपरस्टार' कहा जाता है. ऐसा भी कहा जाता है कि केएल सहगल के होने मात्र से फिल्में सुपरहिट हो जाती थीं. आज जब हम संगीत की दुनिया में 'मेलोडी' की बात करते हैं, तो उसकी नींव रखने वाले शख्स भी कुंदन लाल सहगल ही थे. 11 अप्रैल 1904 को जम्मू के नवा शहर में जन्मे कुंदन के घर में संगीत की कोई खानदानी विरासत नहीं थी. पिता तहसीलदार थे, लेकिन मां केसर बाई के भजनों ने बालक कुंदन के भीतर सुरों का बीज बो दिया. सहगल की तालीम किसी उस्ताद के घर पर नहीं, बल्कि सूफी संतों की दरगाहों और रामलीला के मंचों पर हुई.

घर-घर जाकर बेचा टाइपराइटर 

शायद ही कोई जानता हो कि फिल्मों में आने से पहले केएल सहगल ने रेलवे में टाइमकीपर और बाद में टाइपराइटर बेचने वाले सेल्समैन के तौर पर भी काम किया. सेल्समैन की इसी नौकरी ने उन्हें पूरे भारत की खाक छानने का मौका दिया, जिससे उन्होंने अलग-अलग भाषाओं और सुरों को अपने भीतर उतार लिया. 1930 का दशक भारतीय सिनेमा के लिए 'बोलती फिल्मों' का नया दौर था. सहगल कोलकाता पहुंचे और 'न्यू थिएटर्स' के बीएन सरकार ने उनकी आवाज की खनक पहचान ली. शुरुआत 'सहगल कश्मीरी' नाम से हुई, लेकिन 1935 में आई फिल्म 'देवदास' ने इतिहास रच दिया.

मिर्जा ग़ालिब की गजलों को दी रूह 

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के 'देवदास' को सहगल ने अपनी आवाज और अभिनय से अमर कर दिया. 'बालम आए बसो मोरे मन में' जैसे गीतों ने उन्हें घर-घर की पहचान बना दिया. वह दौर ऐसा था कि लोग ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स सिर्फ इसलिए खरीदते थे क्योंकि उन पर सहगल का नाम होता था. केएल सहगल की आवाज में एक खास किस्म की 'नोजल टोन' थी. शास्त्रीय संगीत के दिग्गज उस्ताद फैयाज खान ने जब उन्हें गाते सुना, तो दंग रह गए. सहगल ने मिर्जा गालिब की गजलों को जो रूह दी, वह आज भी मील का पत्थर है. 'नुक्ताचीं है गमे-दिल' या 'आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक' सुनकर ऐसा लगता है मानो गालिब ने ये शब्द सहगल की आवाज के लिए ही लिखे थे.

शराब की थी बुरी लत

कुंदन लाल सहगल के व्यक्तित्व से जुड़ी एक और बात उनकी शराब की लत भी थी. वह अक्सर रिकॉर्डिंग से पहले शराब मांगते थे, जिसे वह कोड वर्ड में 'काली पांच' (एक खास पेग) कहते थे. दिग्गज संगीतकार नौशाद ने फिल्म 'शाहजहां' (1946) के दौरान उन्हें बिना शराब पिए 'जब दिल ही टूट गया' गाने के लिए राजी किया. जब सहगल ने वह गाना सुना, तो खुद भावुक हो गए और माना कि उनकी आवाज बिना नशे के कहीं ज्यादा साफ और दर्दभरी थी.

1947 में हुआ केएल सहगल का निधन

अफसोस, यह समझ आने तक बहुत देर हो चुकी थी. शराब ने उनके लिवर को खराब कर दिया था. 18 जनवरी 1947 को, जब देश आजादी की दहलीज पर खड़ा था, यह सुरों का शहंशाह दुनिया को अलविदा कह गया. लता मंगेशकर केएल सहगल को अपना गुरु मानती थीं. किशोर कुमार ने जीवन भर सहगल के गीतों को किसी फिल्म में 'रीमेक' करने से इसलिए मना किया क्योंकि वह उन्हें 'गुरु' मानते थे.

आज भी जालंधर का 'केएल सहगल मेमोरियल हॉल' उनकी यादें समेटे खड़ा है. कुंदन लाल सहगल एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने सादगी में महानता खोजी. उन्होंने गजल को महफिलों से निकालकर आम आदमी की जुबां तक पहुंचाया. आज भी जब कहीं पुरानी यादों का जिक्र होता है, सहगल की वह आवाज कानों में रस घोल देती है, 'दुख के अब दिन बीतत नाही...'

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