बॉलीवुड अभिनेता कादर खान ने अपने करियर में कभी विलेन बनकर दर्शकों को डराया, तो कभी कॉमेडी से हंसाया. वहीं अपनी लेखनी से अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार के किरदारों को खास पहचान भी दी लेकिन फिल्मों में आने से पहले कादर खान की जिंदगी बिल्कुल अलग थी. वह सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे और पढ़ाने के साथ थिएटर में भी एक्टिव रहते थे. फिर उनकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित डायलॉग राइटर्स में शामिल कर दिया.
16 पन्नों का डायलॉग
कादर खान के लिखे डायलॉग्स की ताकत का एक बड़ा उदाहरण 1978 में रिलीज हुई फिल्म 'मुकद्दर का सिकंदर' का 16 पन्नों वाला सीन है. कादर खान ने इस सीन में अपने जीवन के अनुभवों को उतार दिया था. जब उन्होंने अमिताभ बच्चन को इसे सुनाया तो बिग बी इतने भावुक हो गए कि उनकी आंखों में आंसू आ गए.
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कादर खान का 22 अक्टूबर जन्म 1937 में काबुल में हुआ था. उनका परिवार बाद में मुंबई आ गया, जहां उन्होंने मुश्किल हालात में अपना बचपन बिताया. पढ़ाई पूरी करने के बाद वह मुंबई के एमएच साबू सिद्दीक पॉलिटेक्निक में लेक्चरर रहे और उन्हें बेस्ट टीचर का अवॉर्ड भी मिला लेकिन पढ़ाने के साथ-साथ एक्टिंग और डायलॉग लिखने का शौक उनके भीतर बना रहा. वह थिएटर में हिस्सा लेते थे और स्टेज पर अपनी प्रतिभा दिखाते थे. इसी दौरान एक नाटक में उनके काम ने लोगों का ध्यान खींचा और उन्हें फिल्मों के लिए डायलॉग लिखने का मौका मिला.
कादर खान की फिल्में
कादर खान ने 1970 के दशक की शुरुआत में फिल्मों के लिए डायलॉग लिखना शुरू किया. 1972 में आई फिल्म 'जवानी दीवानी' को उनके शुरुआती फिल्मी लेखन के अहम पड़ाव के तौर पर याद किया जाता है. इसके बाद राजेश खन्ना की फिल्म 'रोटी' ने उनके करियर को नई पहचान दी.
मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा जैसे डायरेक्टर्स के साथ उनके काम ने उन्हें इंडस्ट्री में मजबूत जगह दिलाई. उन्होंने 'अमर अकबर एंथनी', 'परवरिश', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'लावारिस', 'नसीब' और 'कुली' जैसी फिल्मों के लिए डायलॉग लिखे. उनकी खासियत यह थी कि वह किरदार के हिसाब से भाषा और अंदाज बदल लेते थे. उनके डायलॉग में कहीं इमोशन था, कहीं गुस्सा और कहीं ऐसा मजाक, जो सीधे दर्शकों से जुड़ जाता था.
कादर खान के करियर का एक यादगार किस्सा
कादर खान के करियर का एक यादगार किस्सा फिल्म 'मुकद्दर का सिकंदर' से जुड़ा है. उन्होंने बताया था कि फिल्म में एक सीन था, जिसमें अमिताभ बच्चन का किरदार स्टेज पर अपनी जिंदगी की कहानी सुनाता है. इस सीन को लिखते समय कादर खान ने अपने निजी जीवन के अनुभवों को भी शामिल किया था. यही वजह थी कि वह इस सीन को लेकर काफी भावुक थे. जब उन्होंने इसे फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर प्रकाश मेहरा को सुनाया तो वह भी भावुक हो गए थे.
लेकिन जब यह स्क्रिप्ट अमिताभ बच्चन तक पहुंची तो 16 पन्नों का सीन देखकर वह हैरान रह गए. उन्हें लगा कि इतने लंबे डायलॉग याद करना और उन्हें पर्दे पर सही भाव के साथ बोलना मुश्किल होगा. उन्होंने सीन को छोटा करने की बात कही. कादर खान उस वक्त दूसरी फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थे. फिर अमिताभ बच्चन की तरफ से उन्हें बुलावा आया. कादर खान को लगा कि शायद उनके सीन में कोई कमी निकाली गई है, लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें अपनी बात समझाने का मौका मिला.
जिंदगी से जुड़े अनुभव शब्दों में उतारते
कादर खान ने इंटरव्यू में बताया था कि जब वह अमिताभ बच्चन के पास पहुंचे तो उन्होंने सभी को कमरे से बाहर भेज दिया और खुद पूरा सीन पढ़कर सुनाना शुरू किया. जैसे-जैसे कादर खान अपनी जिंदगी से जुड़े अनुभवों को शब्दों में उतारते गए, सीन का इमोशनल असर सामने आता गया.
कादर खान के मुताबिक, पूरा सीन सुनते-सुनते अमिताभ की आंखों में आंसू आ गए. उन्हें समझ आ गया कि ये सिर्फ लंबे डायलॉग नहीं हैं, बल्कि किरदार की जिंदगी और दर्द को बयान करने वाले शब्द हैं. इसके बाद अमिताभ ने कादर खान से कहा कि वह आगे भी अपनी आवाज में सीन रिकॉर्ड करके दिया करें, क्योंकि उनके सुनाने का अंदाज डायलॉग के भाव समझने में मदद करता था.
कादर खान की पहचान सिर्फ डायलॉग राइटर तक सीमित नहीं रही. 1973 में फिल्म 'दाग' से बतौर एक्टर उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई. गोविंदा के साथ उनकी कॉमेडी वाली फिल्मों ने 1990 के दशक में उन्हें नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच भी लोकप्रिय बनाया. 'दुल्हे राजा', 'कुली नंबर 1' और 'हीरो नंबर 1' जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग खूब पसंद की गई.
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