12 जून का शुक्रवार भारतीय बॉक्स ऑफिस के लिए इस साल के सबसे व्यस्त दिनों में से एक साबित हो सकता है. हिंदी, हॉलीवुड और अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं की 20 से अधिक फिल्में एक साथ सिनेमाघरों में दस्तक देने जा रही हैं. ऐसे में दर्शकों के सामने विकल्पों की भरमार होगी, वहीं फिल्म निर्माताओं के बीच स्क्रीन और शो हासिल करने की होड़ भी देखने को मिलेगी. ट्रेड विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही दिन इतनी बड़ी संख्या में फिल्मों का रिलीज होना सभी फिल्मों के लिए चुनौती खड़ी कर सकता है.
फिल्मों की बाढ़
फिल्म ट्रेड विश्लेषक तरण आदर्श का कहना है, “12 जून को फिल्मों की जैसे बाढ़ आ गई है. एक ही शुक्रवार को इतनी सारी फिल्मों का रिलीज होना स्वस्थ ट्रेंड नहीं कहा जा सकता. इससे स्क्रीन और शो की कमी हो जाती है और दर्शक भी अलग-अलग फिल्मों में बंट जाते हैं.” उनके मुताबिक रिलीज डेट्स के बीच थोड़ा अंतर होना उद्योग के लिए बेहतर रहता.
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मनोज बाजपेयी से लेकर कंगना रनौत की फिल्में
हिंदी फिल्मों की बात करें तो इस शुक्रवार कई चर्चित फिल्में रिलीज हो रही हैं. इनमें मनोज बाजपेयी की “गवर्नर”, इम्तियाज अली की “मैं वापस आऊंगा”, कंगना रनौत की “भारत भाग्य विधाता”, विक्रम भट्ट की “हॉन्टेड 3डी”, “द नर्मदा स्टोरी” और “हीर सारा” शामिल हैं. हॉलीवुड भी इस मुकाबले में पीछे नहीं है. “स्केरी मूवी”, थ्रिलर फिल्म “डिस्क्लोजर डे” और हॉरर फिल्म “बैकरूम्स” भी 12 जून को ही सिनेमाघरों में पहुंच रही हैं.
क्षेत्रीय सिनेमा की तरफ से भी कई फिल्में मैदान में हैं. गुजराती में “जिंदगी हजी बाकी छे दोस्त” और “बंधु ऑलराइट छे”, मराठी में “द महाराष्ट्र फाइल्स”, तमिल में “वल्लुवन” और “हबीबी”, मलयालम में “वरावु” तथा तेलुगु में “सिंग गीतम” और “चारुकेसी” रिलीज हो रही हैं. कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री से “ग्रामायण”, “उत्तरा” और “क्षमेयिराली थांडे” दर्शकों के सामने आएंगी. वहीं बंगाली फिल्म “आबार हवा बदल” और पंजाबी फिल्म “ओए भोले ओए 2” भी इसी दिन रिलीज होने वाली हैं.
मल्टीप्लेक्सों के सामने चुनौती
इस भीड़भाड़ वाले रिलीज शेड्यूल पर निर्माता जयंतीलाल गाडा का नजरिया थोड़ा अलग है. उनकी फिल्म “भारत भाग्य विधाता” भी 12 जून को रिलीज हो रही है. गाडा कहते हैं, “हर हफ्ते छह-सात नहीं बल्कि 20 से 25 फिल्में अलग-अलग भाषाओं में रिलीज होती हैं. मल्टीप्लेक्सों के सामने हमेशा यह चुनौती रहती है कि किस फिल्म को कितनी स्क्रीन और कितने शो दिए जाएं. यह समस्या नई नहीं है और आगे भी बनी रहेगी, क्योंकि देश में हर साल सैकड़ों फिल्में बनती हैं लेकिन साल में सिर्फ 52 हफ्ते ही होते हैं.”
गाडा का मानना है कि आखिरकार दर्शक अच्छी फिल्मों को तलाश ही लेते हैं. उनके शब्दों में, “जब बड़ी फिल्में आती हैं तो निर्माता और वितरक अपनी योजनाओं में बदलाव भी करते हैं, लेकिन अंत में कंटेंट ही सबसे बड़ा सितारा होता है. किसी फिल्म को शुक्रवार को कम स्क्रीन मिल सकती हैं, लेकिन अगर दर्शकों का अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है तो सप्ताहांत तक उसके शो बढ़ सकते हैं. वहीं कमजोर प्रदर्शन करने वाली फिल्मों की स्क्रीन कम हो जाती हैं.”
उन्होंने हाल के वर्षों में कई कम बजट की फिल्मों का उदाहरण देते हुए कहा कि सकारात्मक माउथ पब्लिसिटी आज भी किसी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है. इसलिए शुरुआती स्क्रीन संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण फिल्म का कंटेंट होता है.
अब देखना दिलचस्प होगा कि 12 जून को रिलीज होने वाली इतनी सारी फिल्मों में से कौन दर्शकों का दिल जीत पाती है और बॉक्स ऑफिस पर बाजी मारती है. फिल्म कारोबार से जुड़े लोगों की नजरें फिलहाल इस बड़े मुकाबले पर टिकी हुई हैं.
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