अगर आप कॉमेडी का तड़का देखने चाहते हैं तो अल्ट्रा ओटीटी पर डेविड धवन की फिल्मों का फेस्टिवल शुरू हुआ है. 90 के दशक की ये फिल्में इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं. उस समय की फिल्मों में एंटरटेनमेंट का एक अलग ही अंदाज़ था, हल्की-फुल्की कॉमेडी, पारिवारिक ड्रामा और ऐसे गाने जो सालों तक याद रहते हैं. पुरानी फिल्मों में एक अलग ही सुकून होता है। कहानी सीधी होती है, किरदार याद रह जाते हैं, और गाने अपने आप जुबान पर आ जाते हैं. यही वजह है कि लोग इन्हें बार-बार देखना पसंद करते हैं.
डेविड धवन की ब्लॉकबस्टर फिल्मों का फेस्टिवल
1982 में सुशील कुमार अग्रवाल द्वारा शुरू हुआ यह सफर वीएचएस के दौर से लेकर आज के ओटीटी तक पहुंच चुका है. वक्त बदलता गया, देखने के तरीके बदलते गए, लेकिन अच्छी फिल्मों की अहमियत नहीं बदली. 90 के दशक में ही डेविड धवन की फिल्में भी आईं, जिन्होंने इस स्टाइल को और मजेदार बना दिया. कुली नं. 1, राजा बाबू, हीरो नं. 1, बीवी नं. 1, बड़े मियां छोटे मियां जैसी फिल्में आज भी उतनी ही एंटरटेनिंग लगती हैं, जितनी पहले लगती थीं. इनमें कोई भारी-भरकम कहानी नहीं है, बस सीधा सा मकसद है, आपको हंसाना और अच्छा महसूस कराना. और शायद यही वजह है कि ये फिल्में आज भी हर पीढ़ी को पसंद आती हैं.

राजा बाबू की कहानी जहां गांव के अनपढ़ अनाथ युवक के इर्दगिर्द घूमती है, जो एक अमीर और पढ़ी-लिखी लड़की (करिश्मा कपूर) से प्यार हो जाता है. वहीं, बड़े मियां छोटे मियां में गोविंदा और अमिताभ बच्चन का डबल रोल दर्शकों को गुदगुदाता है. हीरो नं. 1 में जहां अमीर व सख्त पिता का बेटा दिखता है, वहीं बीवी नं. 1 में सलमान खान और करिश्मा कपूर की जोड़ी दिखती है.
अल्ट्रा प्ले ओटीटी पर हजारों घंटे का कंटेंट मौजूद है, जहां नई और पुरानी दोनों तरह की फिल्में मिलती हैं. लेकिन खास बात यह है कि यहां वो फिल्में भी हैं, जिनसे लोगों का एक जुड़ाव है, जिन्हें देखकर एक अपनापन महसूस होता है. नई पीढ़ी भी अब इन फिल्मों को खोज रही है और उन्हें अपने तरीके से एन्जॉय कर रही है. उनके लिए ये फिल्में नई हैं, लेकिन उनका मजा वहीं पुराना और सच्चा है.
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