Mohd Rafi hit songs: मोहम्मद रफी की रेशमी, दिल को छू लेने वाली आवाज का जादू आज भी इतना गहरा है कि उनके गाने दिल में गहराई तक गूंजते हैं. भले ही समय बदल गया हो, लेकिन उनके चाहने वालों की संख्या कम नहीं हुई है. जब उनकी आवाज समाज की बुराइयों पर रोशनी डालती है या कड़वी सच्चाई को सामने लाती है, तो सुनने वाले की सांसें अक्सर थम सी जाती हैं- कुछ देर के लिए तो उसके असर से जम सी जाती हैं. ऐसा ही एक गाना 1964 की फिल्म दोस्ती का है. इसके बोल हैं: "ऐ जाने वालों, पीछे मुड़कर मुझे देखो- मैं भी एक इंसान हूं." सुनने वाले इसे सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि इंसानी जज्बात का सबूत मानने लगे हैं- जिसे समय की धूल कभी धुंधला नहीं कर सकती.
रफी साहब की आवाज ने गाने को बनाया अमर
यह गाना एक दृष्टिहीन इंसान की मनोदशा को ध्यान में रखकर लिखा गया है. इसका संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने दिया था और लिरिक्स मजरूह सुल्तानपुरी के थे. जब इन दो दिगग्ज संगीतकारों की नजमों को रफी साहब की आवाज मिली, तो यह गाना गायकी की दुनिया में अमर हो गया. इस गाने के हर शब्द में मोहम्मद रफी ने उस दर्द को जिया है जो हर अंधे इंसान ने कभी न कभी महसूस किया है, लेकिन वह इसकी शिकायत किसी से नहीं करता, इस गाने के जरिए वह बस एक गुजारिश करता है कि मेरे साथ अपने जैसा बर्ताव करो, मैं भी उसी भगवान की रचना हूं.
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गानें को यहां सुने
पर्दे पर बहता हुआ खामोश दर्द
1964 में जब कलर फिल्मों का ट्रेंड शुरू ही हुआ था, तब डायरेक्टर सत्यन बोस ने इस गाने को ब्लैक एंड व्वाईट के दौर में फिल्माया था. फिल्म में एक अंधे लड़के मोहन का रोल करने वाले एक्टर सुधीर कुमार के हाथ में एक छोटी सी गठरी दी गई थी और उसे दुनिया की भागदौड़ के बीच बिजी सड़कों पर गाते हुए शूट किया गया था. इससे पता चलता है कि लोग अपने-अपने काम में इतने बिजी रहते हैं कि उनके पास किसी की मदद करने का भी टाइम नहीं होता. सड़क पर लड़के की पुकार सुनने के लिए किसी के पास एक पल भी नहीं होता. यह सीन 1964 में जितना सच था, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में और भी कड़वा सच बन जाता है, क्योंकि आज भी लोग मदद का हाथ बढ़ाने से हिचकिचाते हैं.
फिल्म 1964 में आई फिल्म दोस्ती के बारे में
साल 1964 में आई दोस्ती राजश्री प्रोडक्शन्स के बैनर तले बनी एक बेहद भावुक और क्लासिक हिंदी ड्रामा फिल्म है, जिसका निर्देशन सत्येन बोस ने किया था. यह फिल्म दो ऐसे लड़कों की अनूठी कहानी है जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं- एक दृष्टिहीन (मोहन) और दूसरा पैरों से अपाहिज (रामू)- लेकिन उनकी अटूट दोस्ती जीवन की हर कठिनाई को मात देती है.
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