ओह माय गॉड 2 को आए हुए 3 साल बीत गए पर परेश रावल के एक इंटरव्यू के बाद ये फिल्म फिर चर्चा में आ गई. फिल्म कहानी के क्रेडिट से लेकर फिल्म के बनने तक, क्या क्या हुआ ये सब परेश रावल ने बताया जिसके बाद फिल्म के एक प्रोडूसर अश्विन वर्धे ने एक आधिकारिक तौर पर स्टेटमेंट देते हुए परेश रावल द्वारा कही गई कई बातों को गलत ठहराया और फिर उसके बाद फिल्म के लेखक और निर्देशक अमित राय ने इस सब विवाद पर एनडीटीवी से खास बातचीत में अपनी बात रखी. पेश है इस बातचीत के कुछ खास पहलू.
प्रशांत: अमित, मैं सबसे पहले आपसे यह पूछना चाहूंगा कि अभी परेश रावल ने जो इंटरव्यू दिया है, उसमें उन्होंने कहा कि ‘ओह माय गॉड 2' की कहानी उनकी थी. इस पर आपका क्या रिएक्शन है?
अमित: देखिए, उन्होंने जो दावा किया है और प्रोड्यूसर्स ने जो जवाब दिया है, वह दोनों ही अभी पब्लिक डोमेन में हैं. यह उनके और प्रोड्यूसर्स के बीच की बात है. जो घटनाक्रम उन्होंने डिस्कस किया है और जो अश्विन वर्धे सर ने कहा है, उसका जवाब उन्हें मिल चुका है. मैं इस विवाद में पड़ना नहीं चाहता. जहां तक स्क्रिप्ट की बात है, तो मुझे अच्छी तरह याद है. मेरी स्मरण शक्ति कमजोर नहीं है. स्क्रिप्ट की अवधारणा, उसे लिखना, निर्देशित करना, डिजाइन करना और सेंसर बोर्ड के साथ बहस करके फिल्म को बचाना, यह सब मैंने बाकायदा एक व्यवस्थित पद्धति से किया है, जहां ड्राफ्ट रजिस्टर कराए जाते हैं. जो वे दावा कर रहे हैं, क्योंकि वे एक बड़े अभिनेता हैं, मैं उन पर कोई आरोप नहीं लगाना चाहता.
उन्होंने मुझसे इस विषय पर कोई बात ही नहीं की है, तो मैं उसका जवाब कैसे दे सकता हूं? उनके प्रति मेरे मन में सम्मान है. उनके दावे पर मैं बस इतना कह सकता हूं कि स्क्रिप्ट क्या है, यह सबको पता है. बाकी, एक पत्रकार के नाते आप खुद समझ सकते हैं कि इस वाकये को हुए तीन साल हो गए हैं. रही बात क्रेडिट की, तो फिल्म में बतौर प्रोड्यूसर उनका नाम है. जो खुद प्रोड्यूसर है, फिल्म का मालिक है, वह खुद को जो चाहे क्रेडिट दे सकता है. बस वह क्रेडिट खुद को नहीं दे सकता, जो किसी और का हो.
प्रशांत: मैं बस यह पूछना चाहूंगा कि क्या कहानी पूरी तरह आपकी थी, या शुरुआत के विचार उनके थे?
अमित: नहीं, यह बिल्कुल स्पष्ट है. जैसे कोई मेरे पास आए और कहे कि हमें एक हटकर लव स्टोरी लिखनी है, जिसके किरदार लोगों को पसंद आएं, और फिर मैं लिखकर लाऊं, मान लीजिए ‘कबीर सिंह'. तो कल को यह कोई दावा नहीं कर सकता कि उसने ‘ओह माय गॉड 2' जैसी फिल्म चाही थी.
उनके मन में वह फिल्म थी जो उन्होंने ‘ओह माय गॉड' बनाई थी. 10 साल तक वे दूसरी फिल्म नहीं कर पाए थे. वे सोच रहे थे, “क्या ‘ओह माय गॉड 2' जैसी कोई फिल्म बन सकती है? अमित, तुम्हारे मन में ऐसा कोई ख्याल है? क्या हम कुछ कर सकते हैं?” फिर उस कहानी ने जन्म लिया. उन्हें ‘ओह माय गॉड' जैसी फिल्म चाहिए थी.
प्रशांत: यानी उन्हें ‘ओह माय गॉड 2' नहीं, बल्कि ‘ओह माय गॉड' जैसी फिल्म चाहिए थी?
अमित: हां, लेकिन वे ‘ओह माय गॉड 2' ही बनाना चाहते थे. वे इस बात को लेकर बिल्कुल स्पष्ट थे. जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने कहा था कि उन्हें ‘ओह माय गॉड' के स्ट्रक्चर जैसी फिल्म चाहिए. मैं सीक्वल नहीं करना चाहता था. मैंने कहा, “अगर मैं करूंगा, तो अपनी तरफ से कुछ नया करूंगा.” इसीलिए कहानी ने पूरी दिशा बदल ली. उसमें आस्तिक-नास्तिक का जो द्वंद्व आया, वह इसी वजह से आया.
प्रशांत: और आपको यह भी नहीं पता था कि अधिकार किसके पास हैं?
अमित: नहीं. मुझे सामान्य तौर पर पता था कि पहली फिल्म ‘कृष्ण वर्सेस कन्हैया' नाटक पर आधारित थी. वह नाटक मैंने गुजराती और हिंदी, दोनों भाषाओं में देखा हुआ है. इसलिए मुझे लगा कि अधिकार उन्हीं के पास हैं. उसके बाद ‘ओह माय गॉड' बनी, उसमें भी मुख्य अभिनेता वही थे. मुझे, या शायद उन्हें भी, यह इल्म नहीं था कि अधिकार अक्षय कुमार के पास हैं. बाद में पता चला कि हम इसे नहीं कर सकते. जब मैंने उनसे पूछा था, तो उन्होंने कहा था कि सारे अधिकार मेरे पास हैं.
और एक बात मुझे अभी याद आ रही है. उन्होंने कोई दावा किया था, तो मुझे वह नोटिस देखना पड़ेगा. क्योंकि फिल्म में उनका नाम बतौर प्रोड्यूसर गया है. तो फिर बात वहीं खत्म हो जाती है. तीन साल बाद यह सब? मुझे तो ऐसा लग रहा है कि मेरे घर के आगे बारात खड़ी है. मेरी फिल्म 31 तारीख को रिलीज होने जा रही है. अब मैं उस पर ध्यान दूं या यह देखने बैठूं कि पीछे किसी ने दरवाजे पर ताला लगा दिया है.
प्रशांत: आपकी अगली फिल्म का कनेक्शन भी काफी दिलचस्प है, ‘ओह माय डॉग'. ‘ओह माय गॉड' के बाद सबको लगा था कि शायद आप कोई और बड़ी फिल्म करेंगे.
अमित: मैं बड़ी फिल्म ही कर रहा था, जो हो नहीं पाई. उस पर 11-12 महीने खर्च हुए. तब मुझे लगा कि अगर इस सिस्टम में रहकर काम करना है, तो आपको अपना एक इकोसिस्टम बनाना होगा. अगर आप पूरी तरह सिस्टम पर निर्भर रहेंगे, तो फंड, एक्टर और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी बहुत सी चीजों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ेगा. मैंने सोचा कि हम कहानी पर जोर क्यों नहीं दे रहे? ‘मधुमती' के समय ही राजश्री की ‘दोस्ती' भी आई थी और वह भी चली थी. एक तरफ दिलीप कुमार साहब की बड़ी फिल्म हिट हुई थी, तो दूसरी तरफ दो नए लोगों की फिल्म भी सफल रही थी. हम वैसा क्यों नहीं सोच सकते?
मैंने तय किया कि अगर कहानी को आधार बनाएंगे, तो शायद हम वह दौर वापस ला सकते हैं. इसलिए मैंने यह रास्ता अपनाया और खुद प्रोड्यूस करने का फैसला किया. मैंने सुनिश्चित किया कि कहानी अच्छी हो, हर चीज टॉप-नॉच हो. मैंने बेहतरीन तकनीशियनों को चुना. हंगरी के कैमरामैन, अमेरिका से एक्शन डायरेक्टर और बाकी बेहतरीन क्रू के साथ मिलकर हमने यह फिल्म बनाई है.
प्रशांत: बहुत-बहुत शुक्रिया, अमित.
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