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This Article is From Feb 01, 2026

बॉर्डर 2 एक्ट्रेस के पापा ने भी की है भारतीय सेना की सेवा, बोली हर बार पूछती थी घर कब आओगे…

बॉर्डर 2 एक्ट्रेस ने एनडीटीवी से खास बातचीत में अपनी रियल लाइफ और रील लाइफ में समानताओं के बारे में बताया. साथ ही वो दिन भी याद किए जब वो कॉल पर पापा से पूछा करती थीं घर कब आओगे.

बॉर्डर 2 एक्ट्रेस के पापा ने भी की है भारतीय सेना की सेवा, बोली हर बार पूछती थी घर कब आओगे…
बॉर्डर 2 एक्ट्रेस मेधा राणा से खास बातचीत
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नई दिल्ली:

बॉर्डर 2 ने महज 10 दिनों में देशभर में करीब 273 करोड़ रुपये का कारोबार कर लिया है और अभी भी फिल्म के आंकड़ों के बढ़ने की जबरदस्त उम्मीद जताई जा रही है. फिल्म के सभी अभिनेता आपने सोशल मीडिया रील्स और इंटरव्यू में खूब देखे होंगे, लेकिन फिल्म की अभिनेत्रियां अपेक्षाकृत कम सामने आई हैं. इन्हीं अभिनेत्रियों में से एक हैं मेधा राणा, जिनके काम की काफी तारीफ हो रही है. मेधा ने फिल्म में वरुण धवन की पत्नी का किरदार निभाया है.

एनडीटीवी से खास बातचीत में मेधा राणा ने फिल्म, अपने किरदार और निजी अनुभवों को लेकर कई बातें साझा कीं. जब उनसे पूछा गया कि बॉर्डर 2 उनकी शुरुआती बड़ी फिल्मों में से एक है, जिसमें वह दिग्गज कलाकारों के साथ काम कर रही हैं, ऐसे में उनके लिए सबसे मुश्किल दृश्य कौन-सा था, तो उन्होंने कहा 

जवाब: मुझे लगता है वह दृश्य जब होशियार जा रहा होता है और मैं दरवाजे पर खड़ी होती हूं. वही दृश्य जिसमें मुझे रोना आता है. वह भावनात्मक रूप से बहुत परतदार था और उसमें काफी संयम दिखाना था, जो निभाने में चुनौतीपूर्ण था. एक तरफ मेरा किरदार मजबूत दिखने की कोशिश करता है. वह यह जताना चाहती है कि वह फौजी की पत्नी है और सब संभाल लेगी. वह कहती है कि तुम जाओ और लौटकर खुद देखना कि बच्चा क्या हुआ, छोरा या छोरी. बाहर से वह बहुत मजबूत दिखती है, लेकिन अंदर से वह सिर्फ उन्नीस साल की एक बच्ची है. उसकी पूरी दुनिया होशियार ही है. वह उसे छोड़कर मायके आ गई है और भीतर डर, अनिश्चितता और पीड़ा है. उसे नहीं पता कि वह वापस आएगा भी या नहीं. इन सभी भावनाओं को एक साथ उस एक दृश्य में निभाना बहुत कठिन था.

सवाल: फिल्म देखते समय आपको कहां-कहां रोना आया?

जवाब: बहुत जगहों पर. पहले हिस्से में इतना नहीं, क्योंकि वह थोड़ा हल्का था और उसमें हास्य भी था. वह किरदारों और उनकी कहानियों को स्थापित करने का हिस्सा था. मेरे शुरुआती दृश्य में, जब भाई की चिट्ठी आती है, तब मुझे हल्का सा रोना आया, क्योंकि मैंने खुद को पहली बार बड़े पर्दे पर देखा था.

सवाल: उस समय आपके मन में क्या चल रहा था, जब आपने खुद को पहली बार बड़े पर्दे पर देखा?

जवाब: मैं बहुत आत्म-आलोचनात्मक इंसान हूं. मैं सोच रही थी कि मैं ऐसे कर सकती थी, वैसे कर सकती थी. फिर मैंने खुद से कहा कि अब फिल्म को एक फिल्म की तरह, एक प्रोडक्ट की तरह देखना है और अपने किरदार से खुद को अलग रखकर अपनी परफॉर्मेंस को आलोचनात्मक दृष्टि से देखना है. इसके बाद पहले, दूसरे और तीसरे दृश्य के बाद मैंने वरुण के साथ अपने दृश्यों को भी एक सीन की तरह देखा और एंजॉय किया. फिल्म के दूसरे हिस्से में मुझे बहुत जगहों पर रोना आया—“घर कब आओगे” गीत में, “मिट्टी के बेटे” गीत में, जब मोना सिंह का किरदार गुजर जाता है, और जब मेरा किरदार होशियार को अलविदा कहता है. दूसरा हिस्सा तो भावनात्मक रूप से काफी भारी था.

सवाल: आप एक आर्मी फैमिली से आती हैं और एक आर्मी आधारित फिल्म देखती हैं, तो आपको कितना जुड़ाव महसूस होता है?

जवाब: बिल्कुल, मैं खुद को लकी मानती हूं कि मैं उस दौर में पैदा नहीं हुई जब युद्ध को प्रत्यक्ष रूप से देखना पड़ा होता. लेकिन मेरे माता-पिता की पीढ़ी ने युद्ध देखे हैं, उनके माता-पिता ने भी देखे हैं—1965, 1971, 1947–49 और कारगिल युद्ध. उन्होंने ये सब बहुत करीब से देखा है और मैं इन कहानियों को सुनते हुए बड़ी हुई हूं. मैंने बहुत सारे युद्ध आधारित ड्रामा देखे हैं. मुझे यह जॉनर बहुत पसंद है, मुझे इतिहास और जो कुछ हुआ है, उसके बारे में सोचना अच्छा लगता है. मुझे लगता है कि इस फिल्म के बुनियादी भाव, खासकर घर की कहानी, बहुत सच्चे हैं. युद्ध की बातें तो ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित होती हैं, लेकिन जो घर की कहानी दिखाई गई है, जो रिश्ते दिखाए गए हैं, जो अकादमी में अधिकारियों के बीच की दोस्ती दिखाई गई है. वह बिल्कुल सटीक है, क्योंकि असल में ऐसा ही होता है.

यह फिल्म बहुत खूबसूरती से लिखी और बहुत खूबसूरती से निर्देशित की गई है. जितने भी घर के दृश्य हैं, मुझे लगता है कि “घर कब आओगे” गाना अपने आप में बहुत निजी है.

मैं आज किसी और से भी कह रही थी कि मुझे एहसास ही नहीं था कि यह गाना किस स्तर पर निजी है. क्योंकि जब भी पापा की पोस्टिंग फील्ड एरिया में होती थी जम्मू-कश्मीर के आसपास तो हमें फोन का एक्सेस नहीं होता था. उन्हें भी अनुमति नहीं होती थी. फोन पाकिस्तान या चीन की तरफ से टैप हो जाते थे, इसलिए हमें बात करने की अनुमति नहीं होती थी.

तो सबसे पहली चीज जो मैं और मेरी बहन मम्मी से पूछते थे—“पापा कब आएंगे घर?”
जब उनसे दो सेकंड बात होती, तो यही पूछते थे—“कब आओगे? कब छुट्टी मिल रही है?”

तो जिस तरह इस फिल्म ने इन भावनाओं और कहानियों को कैप्चर किया है, मुझे लगता है कि उन्होंने इसे बहुत खूबसूरती से किया है. जिस तरह फिल्म चल रही है और जिस तरह पहली फिल्म चली थी, वह इसका सबूत है. उन्होंने भावनात्मक पहलुओं को बहुत सही तरीके से पकड़ा है. दिल सही जगह पर है.

मेधा राणा को वरुण समेत फिल्म के अन्य कलाकारों से भी काफी सराहना मिली है. वह आगे फिल्मों के लिए ऑडिशन दे रही हैं और उम्मीद जताई जा रही है कि बॉर्डर 2 जैसी बड़ी फिल्म करने के बाद बॉलीवुड के गलियारों में उनके कदम सफलता की ओर और तेजी से बढ़ेंगे.

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