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पाकिस्तान में पुलिस ने किया बैन, हाउसफुल हुआ शो तो पेड़ों पर चढ़ गए लोग- सनी देओल की 'बंटवारा 1947' का अनसुना किस्सा

सनी देओल की फिल्म बंटवारा हिंदी के एक मशहूर नाटक पर आधारित है. आइए जानते हैं इस नाटक को पाकिस्तान में क्यों किया गया बैन और कैसा था इसके मंचन का नजारा.

पाकिस्तान में पुलिस ने किया बैन, हाउसफुल हुआ शो तो पेड़ों पर चढ़ गए लोग- सनी देओल की 'बंटवारा 1947' का अनसुना किस्सा
इस नाटक पर आधारित है सनी देओल की 'बंटवारा 1947'
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नई दिल्ली:

सनी देओल की फिल्म 'बंटवारा 1947' की पहली झलक आ गई है. बंटवारा 1947 का मोशन पोस्टर रिलीज कर दिया गया है. पहले फिल्म का नाम लाहौर 1947 था जिसे अब बदल दिया गया है. फिल्म का निर्देशन राजकुमार संतोषी ने किया है. इसमें सनी देओल के साथ प्रीति जिंटा और शबाना आजमी भी नजर आएंगे. फिल्म 14 अगस्त 2026 को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर रिलीज की जा रही है. लेकिन आप जानते हैं फिल्म की कहानी असगर वजाहत के मशहूर हिंदी नाटक 'जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ' पर आधारित है. ये नाटक वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है और रंगमंच की दुनिया में इसका सिक्का चलता है. आइए जानते हैं ये हिंदी नाटक किस तरह रंगमंच तक पहुंचा और पाकिस्तान में बैन होने के बाद भी इसका मंचन कैसे हुआ.

असगर वजाहत के नाटक 'जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ' का प्रमुख अंश:

"कोई बारह साल पहले जिस लाहौर..." लिखा गया था. मेरा यह मानना है कि नाटक से अधिक नाटकीय होती है किसी नाटक को मंच पर प्रस्तुत होने की प्रक्रिया. इस नाटक के साथ भी यही हुआ. जब नाटक का दूसरा ड्राफ्ट बन गया तो मैंने मित्र नाटक निर्देशकों से कहा कि इसे सुन लें. नाटक का पाठ आयोजित किया गया. कितना नाटकीय था कि आमंत्रित चार-पांच नाटक निर्देशकों में से कोई भी नाटक सुनने नहीं आया. आयोजक गुरुचरन और मैं कई घंटे प्रतीक्षा करने के बाद उदास और निराश अपने-अपने घर चले गए. 

अब देखिए नाटकीयता का दूसरा दौर शुरू होता है. मैं बुदापैश्त में था कि अचानक एक दिन पत्नी का फोन आया कि जिस लाहौर.." हबीब तनवीर श्रीराम सेंटर के साथ मंचित करना चाहते हैं. हबीब तनवीर जिस लाहौर.." नाटक करना चाहते हैं यह खबर अपने आप में कम नाटकीय न थी क्योंकि हबीब साहब की शैली बिल्कुल अलग है नाटक की शैली दूसरी थी. बहरहाल हबीब साहब ने नाटक खेला. आप जानते ही हैं कि सामूहिक कलाभिव्यक्ति में निर्देशक और नाटककार का शत प्रतिशत सहमत होना आवश्यक नहीं है. हबीब साहब ने गायन के माध्यम से यदि नाटक में सराहनीय योग दिया तो दूसरी तरफ उसमें हास्य और अति नाटकीयता और भावुकता भर कर मूल चेतना को कुंठित भी कर दिया. बहरहाल लोगों को नाटक पसंद आया. उसके बाद तो लगातार मंचन होते रहे. करांची और वाशिंग्टन में भी मंचन हुए. मराठी और कन्नड़ में भी प्रस्तुत किया गया. पंजाबी में भी हुआ. श्रीराम सेंटर की 'रेपेट्री' से अलग होकर हबीब तनवीर ने अपनी छत्तीसगढ़ी मंडली के साथ इसके जो प्रदर्शन किए उन्हें देखकर मेरे मन में एक बिम्ब उभरा. एक दुबली-पतली गाय है जिसका दूध मशीन द्वारा दुहा जा रहा है. गाय को देखकर लगता है कि कभी जवान, सुंदर तथा ज़्यादा दूध देने वाली रही होगी पर मशीन इतनी तेजी से उसका दूध दुह रही है कि गाय सूखकर कांटा हो गई है. छत्तीसगढ़ी कलाकारों पर लखनऊ की उर्दू और लाहौर की पंजाबी का ऐसा बोझ पड़ा कि नाटक चरमरा कर बैठ गया. बहरहाल था यह भी नाटकीय.

असगर वजाहत के मशहूर नाटक जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ पर आधारित है बंटवारा 1947

असगर वजाहत के मशहूर नाटक 'जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ' पर आधारित है 'बंटवारा 1947'

वाशिंग्टन में उमेश अग्निहोत्री ने जो मंचन किया था उसका वीडियो देखकर लगा कि बहुत अच्छा प्रदर्शन रहा होगा. करांची में खालिद अहमद ने जो शो किए उनके पीछे की कहानी भी नाटकीय है. पाकिस्तान में नाटक करने के लिए पुलिस कमिश्नर की अनुमति अनिवार्य है. खालिद ने नाटक पुलिस कमिश्नर के यहां जमा कराया और पुलिस ने बताया कि नाटक नहीं हो सकता. कारण दिलचस्प बताए गए. पहला यह कि उसमें मौलवी की हत्या हो जाती है जो इस्लाम विरोधी चीज लगी. दूसरे हिंदू औरत अर्थात् माई का चरित्र जैसा पुलिस चाहती थी वैसा न था. अनुमति न देने की तीसरी वजह यह बताई गई कि नाटककार भारतीय है. पुलिस अनुमति न होने के कारण करांची में नाटक गोथे जर्मन सूचना केंद्र में खेला गया और हर शो 'हाउसफुल' ही न था बल्कि लोग पेड़ों पर चढ़कर नाटक रेख रहे थे. पाकिस्तान अख़बारों में जो समीक्षाएं छपी उन्हें देखकर लगता है कि वहाँ भी ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो हमारी आपकी तरह सोचते हैं. धार्मिक सहिष्णुता और सहअस्तित्व को आदमियत की पहली शर्त स्वीकार करते हैं. 

जिस लाहौर. . . " के जो मंचन मराठी, कन्नड़ और पंजाबी में हुए उन्हें मैंन देख सका. समीक्षाए अवश्य पढ़ी. कन्नड़ निर्देशक ने रायल्टी की रकम भेजकर तो हिंदी के बड़े निर्देशक की इज्जत बचा ली और मुझे यह कहने का अवसर न दिया कि लेखक को नाटक की रायल्टी नहीं मिलती. 

जिस लाहौर. . . " की विषय वस्तु का सूत्र उर्दू के पत्रकार संतोष कुमार की देन है जो 1947 में लाहौर से दिल्ली आ गए थे. इन्हीं दंगों में संतोष जी के सगे छोटे भाई कृश्न कुमार गोटू की सांप्रदायिक दंगे में हत्या कर दी गई थी. यह नाटक उन्हीं को समर्पित है. 

नाटक लिखने में मित्र गुरुचरन ने बड़ी मदद की थी उनका मैं आभारी हूं. न यह कि उन्होंने पंजाबी संवाद बताए बल्कि लाहौर से परिचय प्राप्त करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति को खोज निकाला जो लाहौर की गली-गली से वाक़िफ़ था. प्रिय मित्र डॉ. शमीम हनफी ने उर्दू के प्रसिद्ध शायर नासिर काजमी के कलाम से परिचित कराया. नासिर भी लाहौर में अम्बाला से उजड़ कर पहुंचे थे. मैंने नासिर काजमी को भी नाटक का एक पात्र बना दिया. नासिर काजमी की गजलों ने नाटक में अमूल्य योगदान दिया है." 

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Bollywood, Entertainment, Batwara 1947, Asghar Wajahat
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