एक था टाइगर में अजीत शेनॉय का किरदार भारतीय सिनेमा के मशहूर एक्टर गिरीश कारनाड ने निभाया था. उन्हें नाटककार, एक्टर, डायरेक्टर और राइटर के तौर पर पहचाना जाता था. वे 1974-75 में एफटीआईआई के निदेशक रहे. उन्होंने अपनी किताब ‘खेल-खेल में बीता जीवन' में उन दिनों के कई रोचक किस्से शेयर किए हैं. आप जानते हैं कि ओम पुरी को एफटीटीआई में कोई नहीं लेना चाहता था, उन्हें 'कुरूप' कहकर रिजेकट करने की तैयारी थी. लेकिन गिरीश कारनाड ने ऐसा नहीं होने दिया. पेश है उनकी पुस्तक का एक अंश:
"मेरे फिल्म और टेलीविजन संस्थान के निदेशक बनते ही एक विचित्र नियम पर दृष्टि पड़ी. अभिनय में पढ़ने के लिए प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों के लिए स्क्रीन टेस्ट देना अनिवार्य था. अभ्यर्थी आवेदन पत्र के साथ अपने फोटो तो भेजते ही थे, संस्थान भी इनको कैमरे के सामने खड़ा कर अलग कोणों से फोटो खींचकर यह आकलन करते थे कि इस अभ्यर्थी का चेहरा और व्यक्तित्व रजत पर्दे के लिए योग्य है या नहीं. यानी वह विद्यार्थी पर्दे पर सुन्दर दिख रहा है या नहीं. उस व्यक्ति के सौन्दर्य पर प्रवेश देने की पद्धति थी. मुझे शुरू से ही यह स्वयंवरनुमा चयन प्रक्रिया हास्यास्पद लगती थी. मुझे लगता था कि अच्छे अभिनेता-अभिनेत्री बनने की क्षमता वाले विद्यार्थियों का चयन करना ही हमारा कर्तव्य है, न कि बम्बई के सपनों के कारखाना में किसके शरीर के आकर्षक अंगों की कितनी पूछ होगी आदि आजमाइश करना है. इसलिए मैंने कथित स्क्रीन टेस्ट को रद्द करवाया. अभ्यर्थियों के द्वारा हमारे सामने एक-दो दृश्यों को अभिनीत कर दिखाना ही काफ़ी है, यह सोचकर मैंने एक नियमावली बनाई. इसमें अध्यापक वर्ग की ओर से विशेषता: अभिनय के आचार्य रोशन तनेजा की ओर से विरोध जताया गया. मैंने उस ओर ध्यान नहीं दिया. लेकिन मैंने भी यह अनुमान नहीं लगाया था कि मेरे इस निर्णय से ऐसे तत्काल परिणाम प्राप्त होंगे.

उस वर्ष अभिनय पाठ्यक्रम के लिए उम्मीदवारों में आश्चर्यजनक रूप से अलग दिखने वाला एक छात्र था, जो पहले से ही नई दिल्ली, एन.एस.डी. में प्रशिक्षित था. वह दाग से भरा लम्बा चेहरा, पतला शरीर, गले पर झुर्रियाँ थीं. यदि स्क्रीन टेस्ट होता, तो उसे पहले ही दौर में ख़ारिज कर दिया जाता लेकिन साक्षात्कार में उसने आश्चर्यजनक रूप से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. वह एक असाधारण प्रतिभाशाली अभिनेता के रूप में दिखता है.
मैंने चयन के लिए जिस निर्णायक मंडल (जूरी) को आमंत्रित किया था, उसने उसे सिरे से खारिज कर दिया. उनकी राय थी कि वह निस्सन्देह एक शानदार अभिनेता है, परन्तु असुन्दर चेहरे के कारण उसे फिल्म उद्योग में काम करने से अयोग्य घोषित किया गया है. मैं असहमत था. उसकी कुरूपता उसकी समस्या है, हमारी नहीं. मैंने तर्क दिया: “हमारा काम उसे प्रशिक्षित करना है, यदि उसके पास कोई प्रतिभा है.”
जूरी के केवल एक सदस्य, अभिनेता जयराज, ने मेरे तर्क का समर्थन किया, बाकी लोग अपनी राय में दृढ़ थे. ‘ऐसे कुरूप चेहरे वाला किस प्रकार की भूमिका निभा सकेगा?' उन्होंने प्रश्न किया. उन्होंने सलाह दी कि सिनेमा उद्योग में अपरिहार्य अपमान का सामना करने के बजाय उसका मार्गदर्शन कर एक व्यवसायी के रूप में दिखने के लिए उसे प्रेरित करना चाहिए.
अन्ततः मैंने निर्णायक मंडल के निर्णय को खारिज कर उस युवक को अभिनय पाठ्यक्रम में भर्ती कराया. ओम पुरी ने आगे चलकर मेरे निर्णय की सार्थकता को सुनिश्चित किया. अपनी पीढ़ी के प्रमुख अभिनेताओं में रूप में विकसित होकर, राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त कर, ‘गांधी' और ‘ईस्ट इज ईस्ट' जैसी फिल्मों में अपनी क्षमता सिद्ध कर मेरे विश्वास को सही ठहराया. मैं बहुत प्रभावित हुआ, जब उन्हें बीस साल बाद, लाइफटाइम अचीवमेंट फिल्म फ़ेयर अवार्ड मिला, तो उन्होंने अपने भाषण में यह कहा, “मैं आज यहाँ खड़ा नहीं होता, अगर गिरीश कारनाड ने मिसाल कायम करके मुझे संस्थान में भर्ती नहीं कराया होता।”
इससे बेहतर गुरु-दक्षिणा और क्या हो सकती है, मैं अपने इंस्टिट्यूट के अनुभवों को प्रसंग के माध्यम से कहता हूँ.
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