- ईरान में जब महिलाओं का बोलना भी अपराध था तब फोरूघ ने लिखा, "मैं पाप करती हूं, और पाप करते हुए जीना चाहती हूं."
- शिरिन ने अंतिम समय तक माफी नहीं मांगी. उन्हें वकील नहीं मिला. फांसी के बाद उनकी कब्र तक परिवार को नहीं बताई गई
- रोया हशमती ने हिजाब पहनने से इनकार कर दिया तो उन्हें 74 कोड़े मारे गए वहीं नसरीन सोतूदे आज भी जेल में बंद हैं.
ईरान में मानवाधिकारों की गंभीर स्थिति के बीच उन कुछ महिलाओं की कहानियां जिन्होंने सबसे पहले डर तोड़ा, पर सबसे पहले कुचली भी गईं. जिसे कम ही लोग जानते हैं लेकिन उनकी वजह से आज की ईरानी लड़कियां खड़ी होने की हिम्मत कर पाती हैं. ये कहानियां शोर नहीं करतीं, ये भीतर तक चीर देती हैं. कुछ को गोली मिली. कुछ को फांसी. कुछ आज भी जेलों में सड़ रही हैं. कुछ ऐसी हैं जिनका नाम लेने से भी सत्ता आज डरती है
फोरूघ फर्रुखजादः कविता जिसने स्त्री इच्छा की बात की
फोरूघ सिर्फ कवयित्री नहीं थीं. वह ईरान की पहली महिला थीं जिन्होंने खुले शब्दों में स्त्री इच्छा, अकेलेपन, प्रेम और घुटन की बात की. 1950 और 60 के दशक में जब ईरान में महिला का बोलना भी अपराध माना जाता था, फोरूघ ने लिखा, "मैं पाप करती हूं, और पाप करते हुए जीना चाहती हूं."
उनकी कविताएं पुरुष सत्ता और धार्मिक नैतिकता के लिए सीधी चुनौती थीं. उन्हें चरित्रहीन कहा गया. सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा. सरकारी निगरानी में रहीं. 1967 में एक रहस्यमयी सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई. बहुत से लोग मानते हैं कि यह सिर्फ हादसा नहीं था. फोरूघ की मौत के बाद भी उनकी कविताएं आज की ईरानी लड़कियों के मोबाइल में जिंदा हैं.
अशरफ देहकानी: हथियार उठाने से जेल तोड़ने तक
अशरफ देहकानी शाह के दौर में एक वामपंथी क्रांतिकारी थीं. उन्होंने हथियार उठाया. भूमिगत संगठन बनाए. गिरफ्तार हुईं. उन्हें यातनाएं दी गईं. बिजली के झटके. नाखून उखाड़ना. महीनों अंधेरी कोठरी में रखा गया. वह जेल तोड़ कर भाग निकलीं. पूरे ईरान में क्रांति की अलख जगाई. शाह का शासन ध्वस्त हुआ. सत्ता बदली लेकिन जुल्म नहीं. इस्लामी गणराज्य ने उन्हें फिर दुश्मन घोषित किया. उनके कई साथियों को फांसी दे दी गई. अशरफ को देश छोड़ना पड़ा. आज वह जिंदा हैं, लेकिन निर्वासन में. उनकी कहानी ईरानी महिलाओं को यह सिखाती है कि सत्ता का चेहरा बदले, हथकड़ी नहीं.
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रोया हशमती: 74 कोड़े मारे पर नहीं डरीं
रोया हशमती को साल 2024 की शुरुआत में नैतिकता का सार्वजनिक उल्लंघन करने के आरोप में 74 कोड़े मारे गए थे. यूरोन्यूज के अनुसार, उन्होंने हिजाब पहनने से इनकार कर दिया था. ईरान में महिलाओं का साहस और उनकी आवाज़ सत्ता के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है. रोया हशमती की हिम्मत देखिए कि कोड़े मारने की सजा के दौरान भी उन्होंने हिजाब पहनने से मना कर दिया और कोर्ट में सिर उठाकर चलीं. उन्होंने अपनी आपबीती सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा कि सजा के वक्त वे मन में आजादी के गीत गुनगुना रही थीं.
महसा अमीनीः वो मौत जिसने डर खत्म कर दिया
2022 में महसा अमीनी की मौत तब हुई जब मोरल पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया. सरकार ने कहा दिल के दौरा से चल बसीं, पर जनता ने उसे हत्या माना. महसा अमीनी को नेता नहीं थीं. पर उनकी मौत ने जनांदोलन खड़ा कर दिया. महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से बाल काटे. सड़कों पर उतरीं, विरोध किया. विरोध करने वाली कई महिलाएं आज तक लापता हैं तो सत्ता ने कई को सरेआम फांसी दे दी. लेकिन महिलाओं का डर मर चुका था. ईरान की जेलों में आज भी सैकड़ों महिलाएं हैं. कुछ पत्रकार. कुछ छात्राएं. कुछ मांएं. कई ऐसी जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं. कोई मुकदमा नहीं. कोई खबर नहीं. वहां विरोध करने वाली महिलाओं को मौत की सजा दे दी जाती है और यही ईरान की सबसे डरावनी सच्चाई है.














