Explained: ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन: कौन हैं इस आंदोलन के नेता, दबाव में क्यों है खामेनेई की सत्ता

ईरान में दिसंबर 2025 से जारी विरोध-प्रदर्शन महंगाई से शुरू होकर धार्मिक शासन के खिलाफ बड़े आंदोलन में बदल गए हैं. जानिए कौन हैं इस आंदोलन के नेता और क्यों यह इस्लामी क्रांति के बाद सबसे बड़ा संकट माना जा रहा है.

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नई दिल्ली:

ईरान इन दिनों विरोध प्रदर्शन की आग में झुलस रहा है. देश के हर छोटे-बड़े शहर में लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं. ईरान में यह प्रदर्शन दिसंबर के अंत में शुरू हुए. लोग महंगाई और बढ़ती कीमतों के खिलाफ सड़क पर उतरे. देखते ही देखते इस विरोध-प्रदर्शन ने एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप ले लिया है. प्रदर्शन अब केवल आर्थिक समस्याओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान पर शासन कर रहे धार्मिक शासकों के लिए भी एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है.इन प्रदर्शनों में अब तक पांच सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. आम लोगों के इस प्रदर्शन को ईरान में इस्लामिक  क्रांति के बाद अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन बताया जा रहा है.आइए जानते हैं कि इन विरोध-प्रदर्शनों का नेतृत्व कौन कर रहा है. 

ईरान की इस्लामिक क्रांति

इस समय ईरान के सर्वोच्च धर्मगुरु अयातुल्लाह अली खामेनेई की सत्ता एक बिखरे हुए लेकिन बढ़ते जन दबाव वाले आंदोलन का सामना कर रही है. इन प्रदर्शनों में शामिल विपक्ष संगठित नहीं है. इसमें अलग-अलग विचारधारा और उद्देश्यों वाले कई समूह शामिल हैं. इनमें से कुछ ईरान में सक्रिय हैं तो कुछ निर्वासन (Exile) में रहकर सरकार विरोधी प्रदर्शनों को हवा दे रहे हैं. ये लोग यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों में रहने वाले प्रवासी ईरानियों के संपर्क में हैं. इसी वजह से ब्रिटेन, जर्मनी और अन्य देशों में रहने वाले ईरानियों ने वहां ईरान में हो रहे प्रदर्शनों के समर्थन में रैलियां निकाली हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस समय ईरान में ऐसा कोई एकजुट विपक्ष नहीं है, जो सरकार बना सके. ईरान में रहने वाले और दुनिया के दूसरे देशों में रहने वाले विरोधी गुटों का भी कोई नेटवर्क नहीं है.उनके लक्ष्य भी अलग-अलग हैं. यही वजह है कि ईरान में मौजूदा समय के विरोध-प्रदर्शन का कोई सर्वमान्य नेता बनकर नहीं उभरा है. दरअसल इसके पीछे डर बड़ा कारण है, लोगों को लगता है कि अगर कोई खुलकर सामने आया तो सरकार उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेगी. 

ईरान का विपक्ष और सरकारी दमन

ईरानी सरकार ने पिछले कई दशक में देश के विपक्ष को कुचल दिया है. उसने गैर-राजनीतिक संगठनों, यूनियनों और छात्र समूहों को भी नहीं बख्शा है. इसलिए न तो मजबूत नेतृत्व बन पाया और न जमीनी संगठन. इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि जून 2009 में ईरान में 'ग्रीन मूवमेंट' नाम का एक आंदोलन हुआ था. यह राष्ट्रपति चुनाव में महमूद अहमदीनेजाद की विवादित जीत के खिलाफ शुरू हुआ था. इसमें शहरी मिडिल क्लास, महिलाएं और सिविल सोसाइटी के लोग शामिल थे. उस आंदोलन के नेता मीर हुसैन मूसा्वी थे. वे राष्ट्रपति चुनाव में अहमदीनेजाद के खिलाफ मैदान में थे. लेकिन 2011 में मूसावी और मेहदी कर्रूबी नाम के एक दूसरे नेता को नजरबंद कर दिया गया था.कर्रूबी की नजरबंदी तो पिछले खत्म हो गई थी. लेकिन माना जाता है कि मूसावी अभी भी नजरबंद हैं. इसे देखते हुए ईरान में रहने वाला कोई भी व्यक्ति इन आंदोलनों का नेता नहीं बनना चाहता है. 

ईरान में दिसंबर 2025 में शुरू हुआ आंदोलन सोशल मीडिया प्लेटफार्म, स्टूडेंट और स्थानीय स्तर के नेटवर्क के जरिए संगठित हो रहा है. इससे एक केंद्रीय नेता की जगह कई छोटे-छोटे स्थानीय नेता उभर रहे हैं. नेतृत्व का यही मॉडल नेपाल और बांग्लादेश के हालिया युवा आंदोलनों में भी देखा गया. आइए देखते हैं कि ईरान में सरकार विरोधी आंदोलनों का नेतृत्व कौन कर रहा है. 

रजा पहलवी और राजशाही समर्थक

रजा पहलवी ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बेटे हैं. वे अमेरिका में निर्वासन में रहते हैं. रेजा पहलवी का कहना है कि वो राजशाही की वापसी नहीं बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक व्यवस्था चाहते हैं. उनका कहना है कि इसे जनमत संग्रह से तय किया जाएगा. लेकिन उनके समर्थक उनकी इस राय को लेकर बंटे हुए हैं. उनमें से कुछ रेजा के इस विचार से सहमत हैं तो कुछ चाहते हैं कि ईरान में एक बार फिर राजशाही की वापसी हो.माना जाता है कि इस्लामिक क्रांति में वामपंथी कार्यकर्ताओं का बड़ा हाथ था. अमेरिका के विरोध में उन्होंने इस्लामिक क्रांति का समर्थन किया था. ईरान के बचे-खुचे वामपंथी और लोकतंत्र समर्थक रेजा का विरोध करते हैं. इससे वहां का विपक्ष एक नहीं हो पाता है. 

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ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत पिछले साल दिसंबर में उस समय हुई जब लोग महंगाई आदि के खिलाफ सड़कों पर आ गए थे.

मरियम रजवी और पीपुल्स मुजाहिदीन संगठन

पीपुल्स मुजाहिदीन का एक मजबूत वामपंथी संगठन था. इसने 1970 के दशक में शाह और अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए थे. ईरान-इराक युद्ध के दौरान इस संगठन ने इराक का साथ दिया. इससे ईरान में पीपुल्स मुजाहिदीन की छवि बहुत खराब हुई.इसी समूह ने 2002 में यह बता कर तहलका मचा दिया था कि ईरान गुप्त रूप से यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम चल रहा है.
आज यह संगठन ईरान में निष्क्रिय है. इसके नेता मसूद रजवी कई साल तक फ्रांस और ईराक में निर्वासन में रहे. लेकिन उसके बाद वो करीब 20 साल से सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं. उनकी पत्नी मरियम रजवी संगठन का नेतृत्व करती हैं.पीपुल्स मुजाहिदीन मरियम रजावी के नेतृत्व वाली ईरान की नेशनल काउंसिल ऑफ रेजिस्टेंस का मुख्य ताकत है. यह संगठन कई देशों में रहकर काम करता है. 

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लोकतांत्रिक गणराज्य के समर्थक संगठनों का गठबंधन

साल 2023 में दुनिया के दूसरे देशों में रहने वाले कुछ ईरानी समूहों ने मिलकर एक गठबंधन बनाया. यह गठबंधन धर्म और राज्य को अलग-अलग करने, स्वतंत्र चुनाव और स्वतंत्र न्यायपालिका की मांग करता है. लेकिन इस गठबंधन का प्रभाव ईरान में बहुत सीमित है. साल 2022 में हिजाब न पहनने की वजह से हुई महसा अमीनी नाम की युवती की हत्या के विरोध में हुए प्रदर्शनों के बाद दुनिया के दूसरे देशों में रहने वाले प्रवासी ईरानी समुदाय में इस गठबंधन को थोड़ी-बहुत लोकप्रियता मिली थी.लेकिन ईरान में इस संगठन को बहुत अधिक समर्थन नहीं हासिल है.अमीनी को नैतिकता पुलिस ने गिरफ्तार किया था. हिजाब 1979 की क्रांति के तुरंत बाद लागू किए गए सख्त पहनावे का हिस्सा था.

कुर्द और बलूच अल्पसंख्यक

ईरान की करीब 10 करोड़ की आबादी में करीब 61 फीसदी फारसी हैं. अजरबैजानी और कुर्द इसके मुख्य अल्पसंख्यक समूह हैं. इनकी जनसंख्या करीब 16 फीसदी और करीब 10 फीसदी है. इनके अलावा लूर की आबादी करीब 6 फीसदी, दो फीसदी अरब, दो फीसदी बलूची और दो फीसदी तुर्क हैं. सुन्नी मुस्लिम कुर्द और बलूच तेहरान में फारसी भाषी, शिया मुस्लिम सरकार के साथ लोहा लेते रहते हैं.इन इलाकों में जब भी कोई सरकार विरोधी देशव्यापी आंदोलन होता है,वहां विरोध-प्रदर्शन सबसे तेज होता है. लेकिन इन क्षेत्रों में भी कोई एकजुट विपक्षी नेतृत्व नहीं है.

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