हॉर्मुज संकट से तेल बाजार में हाहाकार, पर ईरान-सऊदी हुए मालामाल- खाड़ी देशों में किसकी चांदी, कौन हुआ तबाह?

हॉर्मुज संकट ने साफ कर दिया है कि केवल तेल आयातक देश ही नहीं उत्पादक भी इससे प्रभावित हो सकते हैं. जिनके पास वैकल्पिक रास्ते हैं वो संभल गए, जिनके पास नहीं हैं वो सबसे अधिक नुकसान झेल रहे हैं. पढ़ें खाड़ी देशों पर इस संकट से क्या असर पड़ रहा है?

विज्ञापन
Read Time: 8 mins
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • तेल की कीमतों में उछाल से ईरान, ओमान और सऊदी अरब की कमाई बढ़ी.
  • इराक और कुवैत, जिनके पास वैकल्पिक रास्ते नहीं हैं, उनकी कमाई बुरी तरह गिरी.
  • सऊदी और यूएई की पाइपलाइन ने असर कम किया, हालांकि यूएई की कमाई थोड़ी घटी.
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

हॉर्मुज स्ट्रेट के बंद होने और इसके चलते तेल की वैश्विक कीमतों में आई तेज उछाल ने ईरान, ओमान और सऊदी अरब को जबरदस्त आर्थिक फायदा पहुंचाया है, जबकि जिन देशों के पास तेल भेजने के वैकल्पिक रास्ते नहीं हैं, उन्हें अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है, यह एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया विश्लेषण में सामने आया है. फरवरी के आखिर में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हवाई हमलों के बाद बढ़ते संघर्ष के चलते ईरान ने हॉर्मुज स्ट्रेट को प्रभावी रूप से बंद कर दिया. यह वही रास्ता है जहां से दुनिया के करीब पांचवें हिस्से का तेल और एलएनजी गुजरता है.
बाद में ईरान ने कहा कि वह उन जहाजों को गुजरने देगा जिनका अमेरिका या इजरायल से कोई संबंध नहीं है. इसके चलते कुछ टैंकर इस संकरे रास्ते से निकलने में सफल भी रहे, लेकिन इसके बावजूद ऊर्जा बाजार में बीते कुछ दशकों की सबसे बड़ी हलचल बनी रही. मार्च में अंतरराष्ट्रीय ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 60 प्रतिशत तक बढ़ गई, जो एक रिकॉर्ड उछाल है. 

जब से ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले ने इस 21 से 24 मील चौड़े समुद्री रास्ते पर अपना गहरा असर डालना शुरू किया है, पूरे एशिया में तेल और गैस का गहरा संकट खड़ा हो गया है. सप्लाई चेन करीब-करीब पूरी तरह से टूट गया है और इससे तेल-गैस की कीमतें आसमान छूने लगी हैं.

सरकारों के पास क्या हैं विकल्प?

अब चूंकि यह संकट लंबा खिंच रहा है और इससे आर्थिक झटके लगने शुरू हो गए हैं तो इससे निपटने के लिए खाड़ी देशों की इन सरकारों के पास विकल्प क्या हैं. एक, वह अपनी बचत का इस्तेमाल कर सकती हैं. दो, वो बाजार से कर्ज ले सकती हैं. ये सभी तेल उत्पादक देश हैं, जहां कर्ज उनकी अर्थव्यवस्था के मुकाबले अधिक नहीं है. लिहाजा कुछ समय के लिए ये इस तेल संकट को संभाल सकते हैं. लेकिन लंबी अवधि में इसका क्या असर होगा यह अभी स्पष्ट नहीं है. कुछ तेल कंपनियां और पश्चिमी देश अब ऊर्जा सुरक्षा के लिए फॉसिल फ्यूल में निवेश बढ़ाने की बात कर रहे हैं. लेकिन जानकार मानते हैं कि असली समाधान अक्षय ऊर्जा है. इसी दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए फ्रांस की टोटलएनर्जी और यूएई की मसदर कंपनी ने एशिया के नौ देशों में 2.2 बिलियन डॉलर का ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट शुरू करने का फैसला किया है.

ये भी पढ़ें: डील करो या तबाही झेलोः ईरान पर ट्रंप की धमकी और दबाव का खेल, 28 फरवरी से अब तक क्या क्या हुआ?

Featured Video Of The Day
Bengal में 90 लाख Voters कटे तो डिबेट में मच गई खलबली! देखिए Political बहस | Sucherita Kukreti