शाह से खामेनेई तक: 47 साल बाद ईरान फिर उसी मोड़ पर, जानिए 1979 की सत्ता क्रांति की पूरी कहानी

ईरान में हालात फिर 1979 की क्रांति जैसे हो गए हैं. तब शाह का तख्त गिरा था, आज निशाने पर सुप्रीम लीडर खामेनेई हैं. महंगाई, बेरोजगारी और दमन से नाराज जनता 100 शहरों में सड़कों पर है. 60 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. रजा पहलवी की अपील से आंदोलन तेज हुआ है. सवाल उठ रहा है कि क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?

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शाह मोहम्मद रजा पहलवी और सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई.

ईरान एक बार फिर इतिहास के उसी मोड़ पर खड़ा है, जहां से 47 साल पहले सत्ता का तख्तापलट हुआ था. फर्क बस इतना है कि तब निशाने पर शाह मोहम्मद रजा पहलवी थे, और आज सत्ता के केंद्र में बैठे हैं सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खाेमनेई.

साल 1979: जब सड़कों से गिरा था शाह का तख्त

1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति ने सदियों पुरानी राजशाही को उखाड़ फेंका था. कारण बने-

बढ़ती महंगाई

बेरोजगारी

पश्चिम समर्थक नीतियां

जनता पर दमन

इन सबके खिलाफ लाखों ईरानी सड़कों पर उतरे. इस जनविद्रोह की वैचारिक अगुवाई कर रहे थे अयातुल्ला रुहोल्लाह ख़ुमैनी. उस वक्त उन्होंने निर्वासन से लौटकर शाह की सत्ता का अंत कर दिया. 

ईरान की 1979 की क्रांति ने शाह मोहम्मद रजा पहलवी के 40 साल पुराने शासन को गिराया था. उस समय उनके बड़े बेटे रजा पहलवी सिर्फ 16 साल के थे. तेल से समृद्ध हजारों साल पुराने साम्राज्य के उत्तराधिकारी. आज 65 साल की उम्र में, लगभग आधी सदी बाद, अपने देश ईरान की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं. उनकी एक आवाज से देश के युवा सड़कों पर उतरे हैं और फिर से इतिहास दोहराने की तैयारी कर रहे हैं. 

रूहोल्लाह खुमैनी से अयातुल्लाह खामेनेई तक पहुंची सत्ता? 

दरअसल ईरान की सत्ता किसी वंश या खून के रिश्ते से नहीं, बल्कि धार्मिक-राजनीतिक उत्तराधिकार से चली है.  रूहोल्लाह खुमैनी और अयातुल्ला अली खामेनेई के बीच पिता-पुत्र या पारिवारिक रिश्ता नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य और क्रांति-सहयोगी का संबंध था.

1979: खुमैनी की क्रांति रंग लाई और नया सिस्टम लागू हुआ. 1979 में शाह का तख्तापलट हुआ और अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी ईरान के पहले ‘सुप्रीम लीडर' बने. इसके बाद खुमैनी ने ईरान में एक नया सिद्धांत लागू किया.

विलायत-ए-फक़ीह (Velayat-e-Faqih)

यानी देश की अंतिम सत्ता एक इस्लामिक धर्मगुरु के हाथ में होगी.

खामेनेई कौन थे उस वक्त?

उस समय अली खामेनेई खुमैनी के करीबी अनुयायी थे. क्रांति में सक्रिय रोल निभा चुके थे. पश्चिम विरोधी कट्टर लाइन के समर्थक थे. खुमैनी उन्हें राजनीतिक रूप से भरोसेमंद चेहरा मानते थे.

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1981-1989: राष्ट्रपति बने खामेनेई

खुमैनी के समर्थन से ही साल 1981 में खामेनेई ईरान के राष्ट्रपति बने. 8 साल तक राष्ट्रपति रहे. इराक-ईरान युद्ध के दौर में सत्ता के केंद्र में रहे. यहीं से खामेनेई सिस्टम के अंदर मजबूत होते गए. फिर आया साल 1989. 

1989 में खुमैनी की मौत हो गई. इस वक्त सबसे बड़ा संकट खड़ा हुआ कि अब सुप्रीम लीडर कौन बनेगा? समस्या यह थी कि खामेनेई उस वक्त धार्मिक रैंक में सुप्रीम लीडर बनने लायक नहीं माने जाते थे. वे ‘ग्रैंड अयातुल्ला' नहीं थे.

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संविधान बदला गया, रास्ता साफ हुआ

यहीं ईरान की सत्ता राजनीति ने करवट ली. संविधान में संशोधन किया गया. सुप्रीम लीडर के लिए धार्मिक शर्तें ढीली की गईं. खामेनेई को अयातुल्ला की उपाधि दी गई और फिर एक्सपर्ट्स काउंसिल ने खामेनेई को सुप्रीम लीडर चुन लिया.

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2026: वही गुस्सा, वही सड़कों का जनसैलाब

आज ईरान में हालात डरावनी तरह से उसी दौर से मिलते-जुलते हैं. 100 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन हो रहा है. महंगाई और बेरोजगारी से जनता त्रस्त. खामेनेई सरकार को इंटरनेट बंद करना पड़ा है. सड़कों पर प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई जा रही हैं. इस सब में अब तक 60 से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं. इस गुस्से की वजह है सत्ता के शिखर पर बैठी वही व्यवस्था, जो कभी क्रांति की उपज थी.

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आम जनता की आवाज बने पहलवी

गौरतलब है कि ईरान में शाह के समर्थन को अपराध माना जाता है, लेकिन सवाल उठ रहा है. क्या लोग सच में राजशाही चाहते हैं या बस मौजूदा धार्मिक शासन से तंग आ चुके हैं? विश्लेषकों के मुताबिक, पहलवी ने अपनी पहचान मज़बूत की है, लेकिन वे एक विवादित चेहरा हैं, सर्वमान्य नेता नहीं. इस्लामी गणराज्य ने दशकों से घरेलू विपक्ष को दबाया है. ऐसे में बाहरी विपक्ष मज़बूत हुआ है, जिसमें पहलवी सबसे चर्चित चेहरा बने. हालांकि, उनके पास ठोस योजना नहीं है. वे सिर्फ संक्रमणकालीन नेतृत्व की बात करते हैं, लेकिन कैसे और किसके साथ, यह स्पष्ट नहीं है. 

ईरान की अर्थव्यवस्था भ्रष्टाचार और प्रतिबंधों से चरमरा चुकी है. युवा पीढ़ी आजादी चाहती है. अगर शासन फिर से हिंसक दमन करता है, तो अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ सकता है. पहलवी इस निराशा और शाह-युग की यादों पर दांव लगा रहे हैं. उन्होंने हाल ही में कहा, 'आज युवा मुझे पिता कहते हैं, और यही सबसे बड़ी बात है.'

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खामनेई का डर: इतिहास खुद को न दोहराए

इस बीच अयातुल्ला खामनेई खुले तौर पर चेतावनी दे रहे हैं, 'ट्रंप को खुश करने के लिए देश को बर्बाद मत करो.' लेकिन ईरान की सड़कों पर उठ रहा सवाल कहीं ज़्यादा तीखा है. क्या इस्लामिक क्रांति की सरकार खुद उसी जनक्रांति का शिकार बनने जा रही है?

सत्ता का चक्र: क्रांतिकारी से शासक तक

जिस व्यवस्था ने शाह को उखाड़ा, वही आज जनता के गुस्से का केंद्र बन चुकी है. तब नारा था: तानाशाही मुर्दाबाद और आज नारा है: खामनेई मुर्दाबाद. इस से एक बात तो साफ है कि इतिहास बदलता नहीं, वह सिर्फ चेहरे बदलता है.

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