ईरान युद्ध के बाद क्या इजरायल का अगला टारगेट तुर्की? जानिए कैसे बन रहे समीकरण

इजरायल की सुरक्षा नीति ऐतिहासिक रूप से बल, रणनीतिक स्वायत्तता और दबाव की क्षमता पर आधारित रही है. प्रधानमंत्री बेन्जामिन नेतन्याहू के समय में ये विचार और अधिक विकसित और व्यावहारिक रूप से लागू हुए हैं.

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बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में इजरायल और ज्यादा आक्रामक रणनीति अपना रहा है.
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  • इजरायल पश्चिम एशिया में सक्रिय और आक्रामक रणनीति अपनाकर पड़ोसी देशों की सुरक्षा और एकता को प्रभावित कर रहा है
  • इजरायल के सैन्य अभियान केवल रणनीतिक लक्ष्य तक सीमित नहीं, बल्कि विरोधी देशों की शासन क्षमता कमजोर करते हैं
  • इजरायल ने सोमालीलैंड को स्वतंत्र मान्यता देकर हॉर्न ऑफ अफ्रीका में तुर्की के प्रभाव को चुनौती दी है
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पश्चिम एशिया में इजरायल की भूमिका पर चर्चाएं अक्सर उस पर होने वाले हमलों और उनके जवाबों के इर्द-गिर्द घूमती हैं, लेकिन हाल के घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि इजरायल केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं दे रहा, बल्कि उन परिस्थितियों को भी तेजी से आकार दे रहा है, जिनमें ये घटनाएं घटित होती हैं. इसमें एक तरफ सीधे हस्तक्षेप शामिल हैं, जो पड़ोसी देशों की सुरक्षा और एकता को प्रभावित करते हैं, जैसा कि सीरिया और ईरान के प्रति उसकी नीतियों में देखा जा सकता है, और दूसरी तरफ क्षेत्रीय रिश्तों को इस तरह विकसित करना भी शामिल है, जो लगातार तनाव को बनाए रखते हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि ये दो प्रक्रियाएं अलग होने के बावजूद परस्पर जुड़ी हुई हैं. साथ मिलकर ये इजरायल को अधिक रणनीतिक स्वतंत्रता और क्षेत्रीय स्थिति को दोबारा परिभाषित करने की क्षमता देती हैं.

इजरायल अब पश्चिम एशिया में एक अधिक सक्रिय और आक्रामक दृष्टिकोण अपनाता दिख रहा है, जिसमें बल प्रयोग, चयनित सैन्य हस्तक्षेप, सुरक्षा साझेदारियां और राजनीतिक परिस्थितियों का प्रबंधन शामिल है.

कमजोर और विभाजित देश

गाजा, लेबनान, सीरिया और अब ईरान का उदाहरण सबसे स्पष्ट है. सैन्य अभियान केवल तत्काल रणनीतिक लक्ष्यों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि शासन क्षमता, बुनियादी ढांचे और क्षेत्रीय अखंडता को कमजोर करने में योगदान देते हैं.

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उद्देश्य सिर्फ दुश्मन को डराकर रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे हालात बनाए रखना भी है, जहां विरोधी देश या समूह कभी पूरी ताकत से उभर न सकें.

यह रणनीति हमेशा तत्काल खतरों से जुड़ी नहीं होती, बल्कि यह उस वातावरण को प्राथमिकता देती है, जिसमें अगर विरोधी आपस में बंटे रहें और कमजोर स्थिति में हों, तो वे एकजुट होकर बड़ी चुनौती नहीं बन पाएंगे.

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इन घटनाओं का असर बदलते अंतरराष्ट्रीय माहौल में और बढ़ता है, विशेषकर अमेरिका के साथ इजरायल के वर्तमान संबंधों के कारण, जो एकतरफा कार्रवाई में अधिक स्वायत्तता और राजनीतिक लागत कम करते हैं.

क्षेत्रीय विभाजन

एक अन्य रणनीति क्षेत्रीय स्तर पर विभाजन और तनाव बनाए रखने पर आधारित है, विशेषकर पूर्वी भूमध्यसागर में. इजरायल की यूनान और साइप्रस के साथ साझेदारियां गहरे सहयोग में बदल रही हैं, जो साझा तकनीक, खुफिया सहयोग, संयुक्त अभ्यास और सामरिक हितों पर आधारित एक एकीकृत सुरक्षा ढांचा बनाती हैं.

यूनान अब इजरायल के रक्षा उपकरणों— जैसे वायु रक्षा, निगरानी और ड्रोन युद्ध— को अपना रहा है. इससे दोनों देशों की सेना का समन्वय आसान होता है और इजरायल को क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे के करीब लाता है.

इजरायल ने तुर्की को भविष्य में एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि ईरान युद्ध के बाद तुर्की चिंता का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है. इससे यूनान और साइप्रस इजरायल के साथ मिलकर तुर्की के साथ समुद्री सीमाओं, ऊर्जा अन्वेषण और हवाई क्षेत्र पर विवादों में अधिक आक्रामक रुख अपनाते हैं.

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दूरस्थ क्षेत्रीय उदाहरण

यह क्षेत्रीय दृष्टिकोण दो स्तर पर काम करता है. आंतरिक स्तर पर: जब कोई देश कमजोर और असंगठित होता है, तो वह खुद ही अपनी ताकत को सीमित कर देता है और बड़े खतरे के रूप में उभर नहीं पाता, जबकि बाहरी स्तर पर जब क्षेत्र में विभाजन और आपसी मतभेद होते हैं, तो देशों के बीच मजबूत और स्थायी गठबंधन नहीं बन पाते.

‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका' में भी इसी प्रकार की रणनीति देखी जा सकती है. ‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका' पूर्वी अफ्रीका के उस सींग के आकार वाले प्रायद्वीप को कहते हैं, जो अरब सागर में सैकड़ों किलोमीटर तक फैला है. इसमें मुख्य रूप से सोमालिया, इथियोपिया, जिबूती और इरिट्रिया देश शामिल हैं. यह क्षेत्र भू-राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है और लाल सागर व अदन की खाड़ी के बीच स्थित हैं.

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इजरायल ने सोमालीलैंड को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी, जिससे बाब-एल-मेंडेब जलडमरूमध्य के पास एक नया राजनीतिक घटक उत्पन्न हुआ. एल-मेंडेब जलडमरूमध्य अरब प्रायद्वीप और अफ्रीका को जोड़ता है और लाल सागर तथा स्वेज नहर तक जाता है.

इस कदम का प्रभाव सोमालिया में तुर्की के प्रभाव के साथ भी जुड़ता है, जहां तुर्की ने गहरे संबंध बनाए हैं और सैन्य एवं नौसैनिक सुरक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन सोमालीलैंड एक अलगाववादी क्षेत्र है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं है. इजरायल की ओर से मान्यता सोमाली तट के साथ नई तनावपूर्ण परिस्थितियां पैदा कर सकती है और उस समुद्री क्षेत्र को जटिल बना सकती है, जिसे तुर्की सुरक्षित बनाने में मदद कर रहा है. पूर्वी भूमध्यसागर की तरह, इसका उद्देश्य प्रत्यक्ष टकराव नहीं है, बल्कि एक जटिल क्षेत्रीय परिदृश्य में खुद को स्थापित करना है, जिसमें नए घटक शामिल होते हैं.

इजरायल की नई सुरक्षा नीति?

इजरायल की सुरक्षा नीति ऐतिहासिक रूप से बल, रणनीतिक स्वायत्तता और दबाव की क्षमता पर आधारित रही है. प्रधानमंत्री बेन्जामिन नेतन्याहू के समय में ये विचार और अधिक विकसित और व्यावहारिक रूप से लागू हुए हैं. इस रणनीति के तहत, शांति केवल अस्थायी और पलटने योग्य स्थिति है, जबकि शक्ति और बल का उपयोग प्राथमिक और अकेला साधन माना जाता है. कमजोर देशों और विभाजित क्षेत्रीय परिस्थितियों के जरिये इजरायल ऐसी स्थिति बना रहा है जहां न देश पूरी तरह स्थिर हो सकते हैं, न ही गठबंधन. इस दृष्टिकोण से इजरायल का लाभ तनाव को नियंत्रित या प्रबंधित करने में है, न कि उन्हें हल करने में.

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