दो देशों की जंग के बीच आम आदमी और नागरिक ढांचे को बचाते हैं ये 4 इंटरनेशनल कानून, फिर भी क्यों नहीं रुकते बड़े देश?

युद्ध के नियम कहते हैं कि लड़ाई सैनिकों और सैन्य ठिकानों तक सीमित रहे, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत दिखती है. जंग में घर, अस्पताल और जरूरी ढांचे तबाह होते हैं. ऐसे में नागरिकों की सुरक्षा के कानून, उनके उल्लंघन और उसके परिणाम समझना जरूरी हो जाता है. आइए जानें जंग को लेकर इंटरनेशनल कानून क्या कहते हैं.

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  • जिनेवा कन्वेंशन के तहत अस्पताल, घर और स्कूल जैसे नागरिक ढांचे पर हमला करना पूरी तरह गैरकानूनी माना गया है.
  • हेग कन्वेंशन ने जंग के नियम बनाए हैं जो बिना सुरक्षा वाले शहरों और गांवों पर हमले को रोकते हैं.
  • नूरेमबर्ग प्रिंसिपल्स के अनुसार बिना सैन्य जरूरत के किसी शहर को तबाह करना वॉर क्राइम है.
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नई दिल्ली:

दुनिया के नियम साफ कहते हैं कि जंग सिर्फ सैनिकों और सैन्य ठिकानों तक सीमित रहनी चाहिए. लेकिन हकीकत में बम सबसे ज्यादा घरों, अस्पतालों और जरूरी सुविधाओं पर गिरते हैं. ऐसे में समझना जरूरी है कि आम लोगों की सुरक्षा के लिए कौन-कौन से कानून बने हैं और जब ये टूटते हैं तो क्या होता है.

जिनेवा कन्वेंशन: आम लोगों की सबसे बड़ी ढाल

जिनेवा कन्वेंशन को जंग के दौरान नागरिकों की सुरक्षा का सबसे मजबूत कानून माना जाता है. इसके तहत साफ कहा गया है कि अस्पताल, घर, स्कूल या किसी भी नागरिक ढांचे पर हमला नहीं किया जा सकता. साथ ही खाने-पीने और पानी जैसी जरूरी चीजों को नष्ट करना भी गैरकानूनी है, क्योंकि इससे सीधे आम लोगों की जिंदगी पर असर पड़ता है.

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हेग कन्वेंशन: जंग के नियम तय करने वाला ढांचा

हेग कन्वेंशन ने सबसे पहले ये तय किया कि जंग कैसे लड़ी जाएगी. इसके मुताबिक बिना सुरक्षा वाले शहरों और गांवों पर हमला नहीं किया जा सकता. साथ ही हर देश की सेना को ये फर्क समझना जरूरी है कि कौन सा निशाना सैन्य है और कौन आम लोगों से जुड़ा हुआ है.

नूरेमबर्ग प्रिंसिपल्स: नेताओं की भी जिम्मेदारी तय

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने इन नियमों ने जंग के कानूनों को और सख्त बना दिया. इसमें कहा गया कि अगर किसी शहर या बस्ती को बिना सैन्य जरूरत के तबाह किया जाता है, तो ये वॉर क्राइम है. सबसे अहम बात ये है कि इसके लिए सिर्फ देश नहीं, बल्कि फैसले लेने वाले नेता और सैन्य अधिकारी भी व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार माने जाएंगे.

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संयुक्त राष्ट्र चार्टर: वैश्विक नियमों की नींव

UN चार्टर यह तय करता है कि कोई भी देश बिना ठोस वजह के दूसरे देश पर हमला नहीं कर सकता. यही चार्टर दुनिया को ये अधिकार भी देता है कि अगर जंग में नियम टूटते हैं, तो उसकी जांच हो और दोषियों पर दबाव बनाया जाए.

क्या अमेरिका, इजरायल और ईरान ने तोड़े ये नियम?

हाल के संघर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों ने आरोप लगाए हैं कि अमेरिका, इजरायल और ईरान. तीनों ने कहीं न कहीं इन नियमों का उल्लंघन किया है. नागरिक इलाकों को नुकसान पहुंचने और जवाबी हमलों में भी वही तरीके अपनाने के आरोप सामने आए हैं.

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कानून टूटने पर क्या सजा होती है?

कागज पर सजा का सिस्टम मौजूद है. इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट नेताओं और सैन्य अधिकारियों पर केस चला सकता है, लेकिन बड़ी ताकतों के इसके सदस्य न होने से कार्रवाई मुश्किल हो जाती है. कुछ मामलों में दूसरे देश कार्रवाई कर सकते हैं या आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, लेकिन ये सब अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर निर्भर करता है. संयुक्त राष्ट्र भी निंदा करता है, मगर ज्यादातर मामलों में ये सिर्फ नैतिक दबाव बनकर रह जाता है.

कानून तो हैं, लेकिन लागू करना मुश्किल

साफ है कि जंग में आम लोगों की सुरक्षा के लिए मजबूत कानून मौजूद हैं, लेकिन जब ताकतवर देश ही इन्हें तोड़ते हैं, तो सजा अक्सर अधूरी रह जाती है. इसका सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को ही उठाना पड़ता है, जो हर जंग में सबसे कमजोर कड़ी होते हैं.

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