ईरान का ऑपरेशन 'लगान'? हिट लिस्ट में वो 5 कौन, जिसका तेहरान ने दे दिया ऑर्डर

  • 18:03
  • प्रकाशित: अप्रैल 15, 2026

कहा जाता है कि जब युद्ध थमता है, तब हिसाब की डायरी खुलती है. ईरान इस वक्त वही डायरी लेकर दुनिया की दहलीज पर खड़ा है. हमलों के बाद हुई तबाही का आंकड़ा पेश करते हुए ईरान की सरकारी प्रवक्ता फातिमा मोहजरानी ने दावा किया है कि शुरुआती अनुमानों के मुताबिक संयुक्त हमलों से ईरान को करीब ₹25,00,000 करोड़ से ज्यादा का सीधा नुकसान हुआ है.


ईरान के सेंट्रल बैंक का कहना है कि इस मलबे से उबरने में देश को कम से कम 12 साल लग सकते हैं. लेकिन तेहरान अब इस बर्बादी का बिल अपने पड़ोसियों — सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन और जॉर्डन — के नाम फाड़ रहा है.


खाड़ी देशों पर गंभीर आरोप
ईरान का आरोप है कि इन देशों ने अपने हवाई क्षेत्र इजराइली और अमेरिकी लड़ाकू विमानों के लिए खोलकर इस आक्रामकता में भागीदारी निभाई. इसी आधार पर ईरान अब इन देशों से युद्ध नुकसान का हर्जाना मांग रहा है.
हालांकि, युद्ध में हर्जाने की मांग कोई नई बात नहीं है, लेकिन इतिहास बताता है कि इसका बोझ कितना भारी हो सकता है.
इतिहास की मिसालें: जर्मनी से इराक तक
प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1919 की वर्साय संधि के तहत जर्मनी पर 132 अरब गोल्ड मार्क्स का हर्जाना लगाया गया था. यह कर्ज इतना भारी था कि जर्मनी को इसे चुकाने में 92 साल लगे और आखिरी किश्त 3 अक्टूबर 2010 को पूरी हुई.
इसी तरह, 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र ने इराक को कुवैत को करीब ₹2 अरब डॉलर का मुआवजा देने का आदेश दिया था, जिसकी अंतिम किश्त इराक ने 2022 में चुकाई.
ईरान अब इन्हीं ऐतिहासिक उदाहरणों और अंतरराष्ट्रीय कानून के सहारे खाड़ी के पांच देशों को घेर रहा है.
संयुक्त राष्ट्र में ईरान की शिकायत
संयुक्त राष्ट्र को लिखे पत्र में ईरान ने साफ तौर पर कहा है कि हमलावरों की मदद करने वाले देशों ने अब सेल्फ डिफेंस का अधिकार खो दिया है. सवाल यह है कि क्या इतिहास खुद को दोहराएगा. क्या ये पांच देश ईरान की तबाही का हर्जाना भरेंगे या मिडल ईस्ट में मुआवजे की यह जंग एक नई भयानक टकराव की जमीन तैयार कर रही है.
बीजिंग में बड़ी तस्वीर, चीन का खुला संदेश
इसी बीच बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल से सामने आई तस्वीरों ने दुनिया की बेचैनी और बढ़ा दी. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और अबूधाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद एक साथ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिले.
पहली बार जिनपिंग ने होरमूज में बढ़ते तनाव पर चुप्पी तोड़ी और चेतावनी दी कि अगर खाड़ी की आग नहीं बुझी तो इसकी लपटें ग्लोबल इकोनॉमी को झुलसा देंगी.
चीन ने साफ कहा कि जहाजों की आवाजाही अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत जारी रहनी चाहिए और अमेरिका को ईरान से दुश्मनी खत्म करनी चाहिए. बीजिंग जानता है कि अगर होर्मुज बंद हुआ, तो उसकी ऊर्जा आपूर्ति ठप हो जाएगी.
अमेरिका पर ईरान का सीधा हमला
उधर तेहरान का पारा सातवें आसमान पर है. ईरान के विदेश मंत्री ने अमेरिका पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि शांति का चोला पहनकर पीठ में छुरा घोंपा गया है. ईरान ने साफ कर दिया है कि अब बातचीत की मेज नहीं बल्कि हिसाब‑किताब का वक्त है.
ईरानी विदेश मंत्री का कहना है कि अमेरिका के साथ बातचीत की अब कोई गुंजाइश नहीं बची है क्योंकि हमले ना करने के वादे से धोखा दिया गया.
हर्जाने की ‘हिट लिस्ट’ और कतर की आपत्ति
ईरान की सरकारी न्यूज एजेंसी आईआरएनए के मुताबिक, तेहरान ने बहरीन, सऊदी अरब, कतर, यूएई और जॉर्डन को उन देशों के रूप में चिन्हित किया है जिन्होंने ईरान के खिलाफ आक्रामकता को बढ़ावा दिया.
हालांकि, कतर ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि उसने युद्ध नहीं छेड़ा, इसलिए भरपाई का सवाल ही नहीं उठता.
होर्मुज ब्लॉकेज से ईरान की अर्थव्यवस्था पर वार
राष्ट्रपति ट्रंप के होर्मुज में नाकेबंदी के फैसले से ईरान की ट्रेड लाइफ लाइन पर संकट गहरा गया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, होर्मुज ब्लॉक होने से ईरान को रोजाना करीब ₹4,081 करोड़ का आर्थिक नुकसान हो रहा है.
ईरान के कच्चे तेल और पेट्रोकेमिकल्स का 45–50 प्रतिशत निर्यात, जो खास तौर पर चीन को जाता था, अब पूरी तरह अधर में लटका है. करीब 154 मिलियन बैरल तेल समुद्र में जहाजों पर फंसा हुआ है, जिसे ईरान बेच नहीं पा रहा.
क्या एक नया विस्फोटक दौर शुरू होगा?
ईरान से उठती वसूली की आवाजों और बीजिंग की कूटनीति के बीच मिडल ईस्ट एक नए मोड़ पर खड़ा है. एक तरफ महाशक्तियां अपनी रणनीति तेज कर रही हैं, तो दूसरी तरफ ईरान नुकसान की भरपाई पर अड़ा हुआ है.
सबसे बड़ा सवाल यही है —
क्या कूटनीति इस महायुद्ध को टाल पाएगी या इतिहास एक नए विनाश का गवाह बनने जा रहा है.
ब्यूरो रिपोर्ट.

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