पत्नी ही 'स्त्रीधन' संपत्ति की एकमात्र मालिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ की स्थिति

Streedhan Laws: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि एक महिला अपनी 'स्त्रीधन' संपत्ति की पूरी तरह से मालिक होती है और कानूनी तौर पर पत्नी पर इस संपत्ति को कथित तौर पर लेने के लिए पत्नी के खिलाफ आईपीसी की धारा 406 के तहत 'विश्वास तोड़ने' का आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahbad High Court) ने कानपुर से जुड़े मामले में पत्नी द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि एक महिला अपनी 'स्त्रीधन'  (Streedhan) संपत्ति की पूरी तरह से मालिक होती है और कानूनी तौर पर पत्नी पर इस संपत्ति को कथित तौर पर लेने के लिए पत्नी के खिलाफ आईपीसी की धारा 406 के तहत 'विश्वास तोड़ने' (criminal breach of trust) का आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि कानून का यह एक स्थापित सिद्धांत है कि किसी महिला को शादी से पहले, शादी के समय या उसके बाद दी गई संपत्ति उसकी 'स्त्रीधन' संपत्ति होती है. यह उसकी पूर्ण संपत्ति होती है, जिस पर उसे अपनी मर्जी से किसी भी तरह का अधिकार जताने या उसे खर्च करने का पूरा हक होता है. पति या ससुराल के अन्य सदस्यों का उसकी 'स्त्रीधन' संपत्ति पर कोई नियंत्रण नहीं होता है.

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति अपनी मुश्किल के समय इस संपत्ति का उपयोग कर सकता है, लेकिन फिर भी उसका यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह उस संपत्ति को या उसके मूल्य को अपनी पत्नी को वापस लौटा दे. इसलिए 'स्त्रीधन' संपत्ति पत्नी और पति की संयुक्त संपत्ति नहीं बन जाती है.

ट्रायल कोर्ट के आदेश को किया रद्द

दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि पत्नी ही 'स्त्रीधन' संपत्ति की एकमात्र मालिक (Absolute Owner) होती है. कोर्ट ने याची पत्नी को बड़ी राहत देते हुए उसकी याचिका को स्वीकार कर लिया और ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए उसके खिलाफ दर्ज मामले में चल रही संपूर्ण कार्यवाही को भी खत्म करने का आदेश दिया है. यह आदेश जस्टिस चवन प्रकाश ने याचिकाकर्ता अनामिका तिवारी और चार अन्य की तरफ से सीआरपीसी की धारा 482 में दाखिल याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है.

क्या है पूरा मामला

दरअसल, याची पत्नी अनामिका तिवारी और अन्य याचिकाकर्ताओं ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए कानपुर नगर के एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट-II द्वारा जारी 17 नवंबर 2022 के समन आदेश और कोर्ट में चल रही पूरी कार्यवाही को रद्द करने के लिए कोर्ट से मांग की थी. याची अनामिका तिवारी और उसके परिवार के खिलाफ 2018 में उसके पति ने कानपुर नगर के थाना पनकी में IPC की धारा 323, 504 और 406 के तहत मामला दर्ज कराया था.

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पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी और उसके परिवार के लोगों ने उसके घर में घुसकर नकदी, आभूषण और घरेलू सामान ले लिया. एफआईआर दर्ज होने के बाद मामले में कानपुर ट्रायल कोर्ट ने पत्नी और अन्य आरोपियों को मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया था, जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी.

2012 में हुई शादी, 2018 में पत्नी ने दर्ज कराई एफआईआर

याचिकाकर्ताओं की तरफ से उनके वकील ने कोर्ट को बताया कि अनामिका तिवारी की शादी 19 अप्रैल 2012 को संपन्न हुई थी. अनामिका के परिवार ने उसके पति को पर्याप्त दहेज दिया था. हालांकि, पति और उसके परिवार के सदस्य दहेज से असंतुष्ट थे और उन्होंने अतिरिक्त मांगना शुरू कर दिया. इससे पत्नी और उसके परिजनों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा. आगे कहा गया कि पत्नी ने 2018 में अपने पति और उसके परिवार के खिलाफ महिला थाने में IPC की धारा 498-A, 323 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी. जांच पूरी होने पर जांच अधिकारी ने 2018 को पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ एक आरोप-पत्र (charge-sheet) दायर किया.

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भरण-पोषण का आदेश मिलने के बाद पति दर्ज कराई झूठी शिकायत

वकील ने कोर्ट में कहा कि पति ने पत्नी के भरण-पोषण की उपेक्षा की, जिससे आवेदक को Cr.P.C. की धारा 125 के तहत एक आवेदन दायर करने के लिए विवश होना पड़ा. इसपर कोर्ट ने पति को यह निर्देश दिया था कि वो याची पत्नी को 4,000 हर महीने और उसके पुत्र को एक हजार हर महीने भरण-पोषण के रूप में देगा. इसके बाद पति ने जवाबी कार्रवाई के रूप में पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ एक झूठी शिकायत दर्ज कराई, जिसमें यह आरोप लगाया गया कि 29 सितंबर 2018 को याची पत्नी ने अन्य याचियों के साथ मिलकर उसके घर में प्रवेश किया और नकद, आभूषण तथा घर का कुछ अन्य सामान उठा ले गए.

पत्नी और अन्य लोगों के खिलाफ पनकी थाने में मामला दर्ज हुआ था. ट्रायल कोर्ट ने सभी को IPC की धारा 323, 504 और 406 के तहत तलब किया. वकील ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के इन धाराओं में कोई अपराध नहीं बनता है. वकील ने दलील दी कि पत्नी अपने स्त्रीधन की पूर्ण स्वामी है और वैसे भी जिन घरेलू सामानों को कथित तौर पर ले लिया गया है वो अधिक से अधिक पति और पत्नी दोनों द्वारा संयुक्त रूप से उपयोग और कब्जे में रखे जाते है.

हाईकोर्ट में दोनों की ओर से दिए गए ये तर्क

हाईकोर्ट में तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट यह दर्ज करने में विफल रहा है कि IPC की धारा 406 के तत्व किस प्रकार लागू होते हैं. ट्रायल कोर्ट द्वारा समन आदेश बिना उचित न्यायिक विवेक के प्रयोग के यांत्रिक तरीके से पारित किया गया है और इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए. वहीं, विपक्षी पक्ष पति के अधिवक्ता ने याचिका का विरोध किया और कहा कि न तो उन्होंने और न ही उनके परिवार के सदस्यों ने कभी किसी अतिरिक्त दहेज की मांग की है. तर्क दिया कि आवेदक पत्नी अब पति के साथ नहीं रह रही है और वह अपने मायके में रह रही है. ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित किया गया आदेश सही है और याचिकाकर्ताओं की याचिका को खारिज किया जाना चाहिए.

कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए क्या कहा

कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद आईपीसी की धारा 406 को समझाया और कहा कि धारा 406 की परिभाषा के अनुसार, यदि कोई संपत्ति किसी व्यक्ति को सौंपी जाती है और वह व्यक्ति बेईमानी से उस संपत्ति का दुरुपयोग करता है या उसे अपने निजी इस्तेमाल के लिए बदल लेता है, तो 'आपराधिक विश्वास भंग' (Criminal Breach of Trust) का अपराध बनता है. कोर्ट ने कहा कि कानून का यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि किसी महिला को शादी से पहले, शादी के समय या उसके बाद दी गई संपत्ति उसकी 'स्त्रीधन' संपत्ति होती है.

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कोर्ट ने कहा कि इस मामले में आवेदक संख्या एक जो विपक्षी संख्या दो की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है. उसको IPC की धारा 406 के तहत मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया गया है, जबकि इस मामले के तथ्यों के अनुसार पत्नी के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है, जहां तक अन्य याचियों के विरुद्ध बाकी धाराओं 323 और 504 का संबंध है वो सामान्य प्रकृति की है. कोर्ट ने या याचिकार्ताओं की याचिका को स्वीकार कर लिया और कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन आदेश मामले के तथ्यों के विपरीत पारित किया गया है और इसलिए इसे रद्द जाता है. इसके साथ ही कोर्ट ने सभी के खिलाफ दर्ज मामले में ट्रायल कोर्ट में चल रही मामले की पूरी कार्यवाही को भी रद्द कर दिया.

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