नोएडा जमीन अधिग्रहण केस में किसानों की 44 साल बाद बड़ी जीत, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बढ़ाया मुआवजा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किसानों की अपील पर 44 साल बाद नोएडा भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक पुराने मामले में किसानों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मुआवजे को बढ़ा कर साढ़े चार गुना से ज्यादा कर दिया है.

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  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 44 साल पुराने नोएडा भूमि अधिग्रहण मामले में किसानों को मुआवजा साढ़े चार गुना बढ़ाया
  • कोर्ट ने किसानों की जमीन के लिए मुआवजा 6 रुपये से बढ़ाकर 28.12 रुपये प्रति वर्ग गज करने का आदेश दिया है
  • निर्णय सुप्रीम कोर्ट के 2022 के अजय पाल सिंह मामले के आधार पर सुनाया गया है जिसमें समान मुआवजे का निर्देश था
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इलाहाबाद:

इलाहाबाद हाई कोर्ट से चार दशक बाद नोएडा के किसानों को बड़ी जीत मिली है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किसानों की अपील पर 44 साल बाद नोएडा भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक पुराने मामले में किसानों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मुआवजे को बढ़ा कर साढ़े चार गुना से ज्यादा कर दिया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1976 के एक पुराने नोएडा भूमि अधिग्रहण मामले में फैसला सुनाते हुए किसानों की अधिग्रहित की जमीन का मुआवजा 6 रुपये से बढ़ाकर 28.12 रुपये प्रति वर्ग गज करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने ये फैसला गांव मोरना, परगना और तहसील दादरी में संबंधित जमीन को लेकर दिया है, जो पहले गाजियाबाद जिले में आती थी और अब नोएडा में आती है. 

अदालत ने क्‍या कहा?

अदालत ने 2022 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अजय पाल सिंह व अन्य बनाम यूपी राज्य और अन्य के मामले में सुनाए हुए फैसले के आधार पर ये फैसला दिया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा 28.12 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से मुआवजा देने का आदेश पारित किया है. कोर्ट ने कहा कि यह स्पष्ट है कि इस मामले में कलेक्टर और रेफरेंस कोर्ट का अवार्ड 30 अप्रैल 1982 से पहले दिया गया था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित उस कानून को देखते हुए अपीलकर्ता अधिनियम में संशोधन (Amending Act) एक्‍ट 68 of 1984 के अनुसार 30% की दर से बढ़ा हुआ मुआवजा (Solatium) पाने के हकदार नहीं हैं. 
अपीलकर्ता अपनी अधिग्रहित भूमि के लिए केवल 15% की दर से मुआवजा पाने के हकदार है. इसी तरह अपीलकर्ता हाईकोर्ट द्वारा उन्हें दिए गए मुआवजे की बढ़ी हुई राशि पर केवल 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज पाने के हकदार होंगे. कोर्ट ने कहा कि यह अपील 20 मई 1982 को दायर की गई थी. लेकिन कोर्ट फीस की कमी 13 जुलाई 1983 को पूरी की गई. इसलिए अपीलकर्ता इस न्यायालय द्वारा दी गई मुआवज़े की बढ़ी हुई राशि पर 20 मई 1982 से 13 जुलाई 1983 के बीच की उस अवधि के लिए ब्याज पाने के हकदार नहीं हैं. कोर्ट ने कार्यालय को उसके मुताबिक डिक्री तैयार करने का निर्देश दिया. यह आदेश जस्टिस संदीप जैन की सिंगल बेंच ने राम करण और अन्य की फर्स्ट अपील याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. 

ये है पूरा मामला 

गाजियाबाद जिले के मोरना, परगना और दादरी तहसील से जुड़ी जमीन किसानों की जमीन को सरकार द्वारा अधिग्रहित किया गया था. याचिकाकर्ता किसानों ने अपनी जमीन के अधिग्रहण पर मुआवजा बढ़ाने को लेकर मई 1982 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए एक फर्स्ट अपील याचिका दाखिल की थी. अपील अपीलकर्ताओं द्वारा मुआवज़े की राशि बढ़वाने के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 54 के तहत दायर की गई थी. यह अपील ज़िला न्यायाधीश गाज़ियाबाद द्वारा LAR संख्या 218/1977 (राम करण और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) में दिनांक 25 नवंबर 1981 को पारित किए गए आदेश और अवार्ड के विरुद्ध थी. इस अवार्ड के तहत ज़िला पहले गाज़ियाबाद जो अब ज़िला गौतम बुद्ध यानी नोएडा है वहां के परगना और तहसील दादरी स्थित गांव मोरना में अधिग्रहित की गई भूमि के मालिकों को 6 रुपए प्रति वर्ग गज की दर से मुआवज़ा और साथ ही भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत अनुमेय अन्य वैधानिक लाभ प्रदान किए गए थे. 

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अपीलकर्ता ज़मीन मालिकों के वकील ने कोर्ट में यह दलील दी कि गांव मोरना, परगना और तहसील दादरी ज़िला गाज़ियाबाद (अब ज़िला गौतम बुद्ध नगर) में स्थित ज़मीन के अधिग्रहण से जुड़ा मामला है जिसे एक जून 1976 की तारीख़ वाले अधिनियम की धारा 4 के तहत जारी अधिसूचना के माध्यम से अधिग्रहित किया गया था और वो अब अंतिम रूप ले चुका है. वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2022 में अजय पाल सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य के मामले में दिए गए आदेश पर 28.12 रुपए प्रति वर्ग गज की दर से मुआवज़ा दिया जा चुका है. कोर्ट में मांग कि गई कि इसलिए इस आधार साथ अपीलकर्ताओं को भी उतनी ही मुआवज़ा राशि प्रदान की जाए जितनी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में प्रदान की गई है. 

लंबी चली किसानों की अदालत में जंग

इलाहााद हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह स्पष्ट है कि इस मामले में यह विषय NOIDA द्वारा ग्राम मोरना, परगना और तहसील दादरी, जिला गाजियाबाद (अब जिला गौतम बुद्ध नगर) की भूमि के अधिग्रहण से संबंधित है. यह भूमि अधिनियम की धारा 4 के तहत दिनांक एक जून 1976 की अधिसूचना के माध्यम से अधिग्रहित की गई थी. धारा 6 के तहत घोषणा 1976 को प्रकाशित की गई थी और कलेक्टर का अवार्ड (निर्णय) मई 1977 को पारित किया गया था. इसके तहत भूमि मालिकों को 'चाय' भूमि के लिए 10,225  रुपये प्रति बीघा और 'खाकी' भूमि के लिए 7,570 रुपये प्रति बीघा की दर से मुआवज़ा दिया गया था, जिसे रेफरेंस कोर्ट ने बढ़ाकर छह रुपये प्रति वर्ग गज कर दिया है. रेफरेंस कोर्ट ने बढ़ाई गई मुआवज़े की राशि पर 15% की दर से सोलेशियम (अतिरिक्त मुआवज़ा) और 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी प्रदान किया है. कोर्ट ने माना कि सुप्रीम कोर्ट ने अजय पाल सिंह के मामले में वर्ष 1976-1977 में NOIDA द्वारा भूमि अधिग्रहण के संबंध में 28.12 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से मुआवज़ा देने का आदेश दिया है. 

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इसे देखते हुए अपीलकर्ता भी उसी दर पर मुआवज़ा पाने के हकदार है जिस दर पर सुप्रीम कोर्ट ने उसे मामले में मुआवज़ा देने का आदेश दिया था. कोर्ट ने इस आधार पर अपील स्वीकार कर ली और आदेश दिया कि अपीलकर्ता ग्राम मोरना, परगना एवं तहसील दादरी, जिला गाजियाबाद (अब जिला गौतम बुद्ध नगर) में स्थित अधिग्रहित भूमि के लिए 28.12 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से मुआवजा पाने के हकदार है. वहीं कोर्ट ने पक्षकारों के निधन के बाद उनके वारिसों से जुड़े रिकॉर्ड को शामिल करने वाले विलंब माफी आवेदन को स्वीकार कर लिया जिसमें बताया गया था. 

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